डॉ विनय कौडा
‘हिन्द महासागर से गहरी और हिमालय से ऊंची’ दोस्ती का दम भरने वाले पाकिस्तान और चीन के रिश्ते इतने कमजोर नहीं हैं कि उनमें आसानी से दरार आ सके। इसलिये यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा कि जिनजियांग में उइगर अलगाववाद के तार पाकिस्तान से जुड़े होने के अकाट्य प्रमाण सामने आने के बाद चीन की आंखों से पाकिस्तान-परस्ती का चश्मा उतर जायेगा। अब तक तो केवल भारत और अमरीका ही पाकिस्तान पर इस बात के लिये दबाव बनाते आये हैं कि वह अपनी जमीन को जिहादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने से रोकने के लिये सख्त से सख्त कदम उठाये, लेकिन पाकिस्तानी हुक्मरानों की कान पर जूं तक नहीं रेंगती। क्या चीन द्वारा पाकिस्तानी पर अपने कबायली इलाकों से नापाक गतिविधियां चलाने वाले उइगर आतंकी समूहों पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाने से पाकिस्तानी सेना की नींद खुलेगी?
चीन को इसमें कोई संदेह नहीं है कि शिनजियांग प्रांत में जुलाई में होने वाले आतंकवादी हमलों की जड़ें पाकिस्तान के आतंकी कारखानों तक फैली हैं। चीन की असहजता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अनमने मन से उसे अपने घनिष्ट मित्र पाकिस्तान को इसके लिये जिम्मेदार ठहराना पड़ा। हालांकि इस आरोप के बाद चीन ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को अपना साथी बताते हुए पाकिस्तान की सराहना करने में भी ज्यादा देर नहीं लगायी। बुनियादी सवाल यह है कि क्या चीन के आरोप भारत के उस तर्क की पुष्टि नहीं करते हैं कि पाकिस्तानी सेना की देखरेख में ही आतंकी शिविर चल रहे हैं। चीन ने कभी भी भारत के आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया। जब मौका मिला तो पाकिस्तान की तरफदारी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। आज जब पाक-प्रशिक्षित उइगर आतंकियों ने चीन की धरती को लहूलुहान करना आंरभ कर दिया है तो चीन के रवैये में बदलाव क्यों आया? क्या आतंक को प्रश्रय देने के संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर चीन पहले अनजान था?
चीन अपनी संप्रभुता को मिलने वाली चुनौतियों पर बहुत ज्यादा संवेदनशील और आशंकित रहता है। इस मामले में उसकी सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान में कार्यरत चीनी नागरिकों के जीवन पर मडंराता खतरा है। ऐसा देखने में आया है कि वहां चीनी नागरिकों पर कई बार हमले हो चुके हैं। इसके अलावा चीन को यह बात काफी समय से अखर रही है कि इस्लामिक मूवमेंट ऑफ ईस्ट तुर्किस्तान (आईएमईटी) से संबंधित उइगर आतंकियों के विरु द्ध ठोस कार्रवाई करने में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां या तो नाकाम रही हैं या फिर अनिच्छुक।
पाकिस्तान भी चीन की चिंताओं के प्रति अधिक संवेदनशील है, क्योंकि पाकिस्तानी हुक्मरान चीन को नाराज करने की सामरिक कीमत से पूरी तरह वाकिफ हैं। स्मरण रहे कि जनरल परवेज मुशर्रफ इस्लामाबाद की प्रख्यात लाल मसजिद पर कब्जा जमाने वाले तालिबान कट्टरपंथियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से परहेज करते रहे लेकिन छह चीनी महिलाओं के अपहरण के बाद चीन की ओर से पाकिस्तान पर पड़े दबाव की वजह से उन्हें लाल मसजिद में कमांडो कार्रवाई का आदेश देना पड़ा। नई गिलानी सरकार भी चीन की चापलूसी में किसी मायने में परवेज मुशर्रफ से कम नहीं है। गृहमंत्री रहमान मलिक ने अपनी सरकार के सत्तारूढ़ होने के एक साल बाद बीजिंग यात्रा में यह कहा था कि चीन के दुश्मन पाकिस्तान के दुश्मन हैं।
आगे चर्चा करने से पहले शिनजियांग प्रान्त और उइगरों के बारे में जानना जरूरी है। चीन के पश्चिमी प्रान्त शिनजियांग की सीमा भारत, पाकिस्तान, किरगिजस्तान, उज्बेकिस्तान और मंगोलिया को स्पर्श करती है। करीब 16 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला शिनजियांग प्रांत चीन के कुल भू-भाग का 17 प्रतिशत है और उसकी आबादी करीब दो करोड़ है। वैसे तो यहां तीन दर्जन से भी ज्यादा जाति समूह के लोग निवास करते हैं, परन्तु 45 प्रतिशत उइगर लोगों का यहां बहुमत है।
उइगर लोग इस्लाम को मानने वाले हैं। शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों की विशाल आबादी चीन की नजरों में हमेशा खटकती रही है। उसे उइगर मुसलमानों की राष्ट्रभक्ति को लेकर हमेशा संदेह रहा है। पिछले छह दशक के दौरान चीनी सरकार ने हान वंश के पक्ष में जो नीतियां अपनायी, उसके कारण उइगर लोग हर दृष्टि से कमजोर होते चले गये। गैर-उइगरों की तादाद 55 प्रतिशत होने से उइगर अपने ही घर पर अल्पसंख्यक हो गये। तिब्बत की ही भांति शिनजियांग में भी चीन की प्रमुख जाति हान को साम्यवादी सरकार ने योजनाबद्ध तरीके से बड़ी संख्या में बसा दिया जिससे वे शिनजियांग के मालिक बन गये हैं।
स्थानीय प्रशासन में उइगरों का प्रतिनिधित्व नाममात्र का है। नस्लीय, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई और रहन-सहन के लिहाज से उइगरों और हान वंशियों में जमीन-आसमान का अंतर है। उच्च पदों और प्राकृतिक संसाधनों पर हान लोगों का कब्जा होने के कारण उनका जीवन स्तर बहुत उंचा हो गया है, जबकि उइगर जाति दयनीय दशाओं में जीवन जीने को अभिशप्त हैं। यह नहीं भूलना चाहिये कि हर जाति समूह को अपनी भाषा, संस्कृति और धर्म से बेहद लगाव होता होता है और इन मुद्दों में वह अनावश्यक हस्तक्षेप आसानी से बर्दाश्त नहीं करता है। अवसर की समानता, भावनात्मक सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं का घोर अभाव ही घनघोर असंतोष को जन्म देता है। उइगर मुसलमानों को अपनी सभ्यता-संस्कृति की चिंता सता रही है और वे स्वायतता की मांग कर रहे हैं।
सामाजिक-आर्थिक विषमता के अलावा उइगरों की भावनाओं को भडक़ाने में ऐतिहासिक तथ्यों की भी भूमिका रही है। यह बात जगजाहिर है कि चीन की उत्तरी और पश्चिमी सीमा पर स्थित तिब्बत, मंगोलिया और शिनजियांग कुछ ऐसे प्रदेश हैं जिन पर चीन का स्थायी कब्जा नहीं रह पाया। पिछली शताब्दी में दो बार शिनजियांग, चीन के हाथ से फिसलकर ‘पूर्वी तुर्किस्तान का इस्लामी गणराज्य’ बन गया था लेकिन माओ की लाल क्रांति के बाद चीन ने उसे फिर से हथिया लिया। चीन की साम्यवादी सरकार अपने विरुद्ध उठे किसी भी विद्रोह का दमन किस बेरहमी से करती है, इसका उल्लेख करने की जरूरत नहीं है। शिनजियांग के उइगरों पर भी चीन ने बहुत कहर ढ़ाया। लेकिन उइगर लोगों में आजादी की लालसा समय-समय पर जोर मारती रहती है।
इस पृष्टभूमि में पाकिस्तान की भूमिका प्रबल हो जाती है। पाकिस्तान में जिहादी आतंकवाद के फलने-फूलने के बाद से ही उइगर आतंकियों का जोश सातवें आसमान पर है। चूंकि उइगर लोग मुसलमान हैं तो पाकिस्तान के जिहादियों-कट्टरपंथियों में उइगरों के लिये विशेष सहानुभूति होना स्वाभाविक है। शिनजियांग के उइगुर मुसलमानों को पाकिस्तान में अल-कायदा और अन्य सहयोगी आतंकी संगठनों द्वारा आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिसका सबूत अमरीकी फौज द्वारा उत्तरी वजीरिस्तान से उइगरों की गिरफ्तारी से भी मिला था। उइगुरों को पाकिस्तान से संचालित वैश्विक जिहादी नेटवर्क का समर्थन मिलना चीन की सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। चीन ने अभी अपना सारा ध्यान पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामी आंदोलन नामक आतंकी संगठन पर केन्द्रित कर दिया है जो शिनजियांग के उइगरों को भडक़ाने-उकसाने में जुटा है। इस संगठन की गतिविधियों का मुख्य केंद्र पाकिस्तान और अफगानिस्तान से जुड़े सीमावर्ती इलाकों में है।
इस साल मई के आरंभ में जब एबटाबाद में जब वैश्विक जिहाद के मसीहा ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने मार गिराया तो वीटो शक्तिधारी देशों में केवल चीन ही वह देश था जिसने पाकिस्तान को दुनिया की आलोचना से बचाया। चीन ने पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी जताते हुए यहां तक कह दिया था कि पाकिस्तान पर होने वाले किसी भी हमले को वह अपने खिलाफ कार्रवाई मानेगा। चीन भले ही यह बात खुले तौर पर स्वीकार न करे लेकिन सच्चाई तो यही है कि जिहादी आतंकवाद ने जिस तरह चीन में दस्तक दी है, वो चीन द्वारा आंख मूंदकर पाकिस्तान की पीठ थपथपाने का ही नतीजा है। आतंक के इस खौफनाक अवतार से चीन भी अछूता नहीं रहा है।
शिनजियांग में भडक़ रही जिहादी हिंसा के लिये पाकिस्तान पर अंगुली उठाकर चीन ने साफ तौर पर पाकिस्तानी हुक्मरानों को बता दिया है कि वह अपनी संप्रभुता की कीमत पर कोई दोस्ती नहीं गांठता और आतंकियों पर लगाम कसने में कोताही बरतने का खामियाजा पाकिस्तान को ही भरना पड़ेगा। आतंकवादियों को ‘गैर-राज्यीय तत्व’ करार देने की पाकिस्तानी दलीलों का चीन पर कोई असर नहीं होगा। आज जब अमरीका-पाकिस्तान संबंध बेहद तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं, पाकिस्तान के लिये चीन के साथ संबंध सबसे महत्वपूर्ण हैं। चीन द्वारा उइगर आतंकियों के पाकिस्तान में प्रशिक्षण की बात कहे जाने के बाद आईएसआई प्रमुख अहमद शुजा पाशा ने बीजिंग पहुंचकर चीन की शिकायतों को दूर करने में देर नहीं लगायी। वैसे चीन भी अच्छी तरह जानता है कि सामरिक रूप से पाकिस्तान उसके लिये बहुत अहमियत रखता है। तभी तो फटकार लगाते ही पुचकार लिया।
Saturday, August 6, 2011
Wednesday, July 27, 2011
हिलेरी की ख्वाहिश
इस बार अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा कोई खास कमाल नहीं दिखा पायी। कल तक चीन को एशिया का नेतृत्व करने की सलाह देने वाले अमरीका की विदेश मंत्री द्वारा आज भारत को चीन से मुकाबला करने के लिये कमर कसने की सलाह अमरीकी अवसरवाद का ही नमूना है। आतंकी नेटवर्क के खिलाफ जंग में भारत को घनिष्ठ सहयोगी बताने और 2008 के मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं को सजा दिलाने की जरूरत पर बल देने के हिलेरी के बयान घिसे-पिटे और खोखले हैं।
पाकिस्तान से अपना काम निकालने के लिये अमरीका साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रपंचों को इस्तेमाल कर रहा है। परन्तु जब पाकिस्तान में विराजमान भारत विरोधी ताकतों के दमन की बात उठती है, तो अमरीकी प्रयास जबानी-जमाखर्च से आगे नहीं निकल पाते। पाकिस्तान को भारत विरोधी मुहिम समाप्त करने के लिये विवश करने की ओबामा प्रशासन की फिलहाल कोई योजना नहीं है। दरअसल भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा के साथ बातचीत में हिलेरी ने चतुराईपूर्वक कहा कि 2008 के मुंबई हमले के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमरीका, पाकिस्तान पर दबाव तो अवश्य बनायेगा लेकिन उसकी भी कुछ सीमाएं हैं। अब हिलेरी या ओबामा से यह पूछने का साहस कौन जुटा पाये कि तालिबानी शासन को उखाडऩे के लिये 2001 मेें अफगानिस्तान पर फौजी हमला और आतंक के सरगना बिन लादेन को मारने के लिये पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते समय उन कथित ‘सीमाएं’ की याद अमरीका को क्यों नहीं रही जिसकी दुहाई आज वो भारत को दे रहा है।
हकीकत यही है कि अमरीका उसी आतंकवाद से सख्ती से निपट रहा है और निपटेगा जो केवल उसके लिये खतरा पैदा करता है। हालांकि पिछले दिनों अमरीका ने पाकिस्तान को प्रतिवर्ष दी जाने वाली सैनिक सहायता के कुछ हिस्से पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन अमरीका का यह कदम अफगान समीकरण की उपज है, न कि भारत की गुहार का परिणाम। वैसे आतंकवाद के मसले पर अमरीका ने भारत को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। ऐसा लगता है कि अमरीका यह बात समझ चुका है कि भारत में पाकिस्तान प्रायोजित बम धमाकों के तुरंत बाद पीडि़त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने और किसी बड़े अमरीकी पदाधिकारी की भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान को आतंकवाद के लिये फटकार लगाने से ही काम चल जायेगा। भारत को बहुत हल्के तौर पर लेने की एक बड़ी वजह यह भी है कि हमारी पाकिस्तान नीति में ही स्पष्टता नहीं है। कभी बातचीत चालू और कभी बातचीत बंद।
भारत के लिये यह तथ्य कोई सनसनीखेज नहीं है कि कश्मीर मुद्दे पर अमरीकी नीति को प्रभावित करने के लिए पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई अमरीकी नेताओं को डॉलर में तोलने से भी परहेज नहीं करती है। इसी हफ्ते यह खुलासा हुआ है कि पाकिस्तानी मूल के सैयद गुलाम नबी फई और जहीर अहमद अमरीका में गैरकानूनी तरीके से लॉबिंग का काम कर रहे थे। अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई का आरोप है कि दोनों लम्बे समय से अमरीका में साजिश रच रहे हैं और पाकिस्तान सरकार के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। भारत इस बात से अच्छी तरह अवगत है कि पाकिस्तान हर मुमकिन तरीके से भारत विरोधी षड्यंत्र करता रहता है। पश्चिमी देशों, खासकर ब्रिटेन और अमरीका, में कश्मीरी आतंकवादियों को वहां के राजनेता गैर सरकारी संगठनों की आड़ में सरंक्षण और पोषण देते रहे हैं।
कितनी अजीब बात है कि अब भारत के इन दावों को इसलिये गंभीरता से सुना-समझा जायेगा क्योंकि एफबीआई ने उस पर मुहर लगा दी है। एक तरफ तो पाकिस्तानी फौज पर दबाव डालने में आनाकानी और दूसरी तरफ अमरीका में भारत-विरोधी षड्यंत्रकारियों का पर्दाफाश। अमरीका की इस विरोधाभासी नीति को समझे बिना भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर सकता। क्या यह बात आसानी से भुलाई जा सकती है कि अतीत में भारत के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा किये गये कुचक्रों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अमरीका की भी भूमिका रही है।
पाकिस्तान की नीयत में खोट होने के अनगिनत सबूत मिल चुके हैं। आतंकवाद पाकिस्तान का मूल चरित्र है जिसका प्रयोग उसने भारत को डराने और अमरीका को उलझाने के लिये ही किया है। जब तक अमरीका आतंक के सबसे बड़े पोषक देश पाकिस्तान को आतंक के खिलाफ अभियान में सहयोगी मानने की भयंकर भूल करता रहेगा, तब तक भारत से निकटता स्थापित करने के उसके सभी प्रयास आधे-अधूरे एवं अवसरवादी ही माने जायेंगे। अगर अमरीका के कंधों पर नाच रहे पाकिस्तानी हुक्मरानों की अक्ल हमेशा के लिये ठिकाने लगा दी जाये तो एशिया का नेतृत्व भारत के हाथ में देखने की हिलेरी की ख्वाहिश अधूरी नहीं रहेगी।
पाकिस्तान से अपना काम निकालने के लिये अमरीका साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रपंचों को इस्तेमाल कर रहा है। परन्तु जब पाकिस्तान में विराजमान भारत विरोधी ताकतों के दमन की बात उठती है, तो अमरीकी प्रयास जबानी-जमाखर्च से आगे नहीं निकल पाते। पाकिस्तान को भारत विरोधी मुहिम समाप्त करने के लिये विवश करने की ओबामा प्रशासन की फिलहाल कोई योजना नहीं है। दरअसल भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा के साथ बातचीत में हिलेरी ने चतुराईपूर्वक कहा कि 2008 के मुंबई हमले के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमरीका, पाकिस्तान पर दबाव तो अवश्य बनायेगा लेकिन उसकी भी कुछ सीमाएं हैं। अब हिलेरी या ओबामा से यह पूछने का साहस कौन जुटा पाये कि तालिबानी शासन को उखाडऩे के लिये 2001 मेें अफगानिस्तान पर फौजी हमला और आतंक के सरगना बिन लादेन को मारने के लिये पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते समय उन कथित ‘सीमाएं’ की याद अमरीका को क्यों नहीं रही जिसकी दुहाई आज वो भारत को दे रहा है।
हकीकत यही है कि अमरीका उसी आतंकवाद से सख्ती से निपट रहा है और निपटेगा जो केवल उसके लिये खतरा पैदा करता है। हालांकि पिछले दिनों अमरीका ने पाकिस्तान को प्रतिवर्ष दी जाने वाली सैनिक सहायता के कुछ हिस्से पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन अमरीका का यह कदम अफगान समीकरण की उपज है, न कि भारत की गुहार का परिणाम। वैसे आतंकवाद के मसले पर अमरीका ने भारत को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। ऐसा लगता है कि अमरीका यह बात समझ चुका है कि भारत में पाकिस्तान प्रायोजित बम धमाकों के तुरंत बाद पीडि़त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने और किसी बड़े अमरीकी पदाधिकारी की भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान को आतंकवाद के लिये फटकार लगाने से ही काम चल जायेगा। भारत को बहुत हल्के तौर पर लेने की एक बड़ी वजह यह भी है कि हमारी पाकिस्तान नीति में ही स्पष्टता नहीं है। कभी बातचीत चालू और कभी बातचीत बंद।
भारत के लिये यह तथ्य कोई सनसनीखेज नहीं है कि कश्मीर मुद्दे पर अमरीकी नीति को प्रभावित करने के लिए पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई अमरीकी नेताओं को डॉलर में तोलने से भी परहेज नहीं करती है। इसी हफ्ते यह खुलासा हुआ है कि पाकिस्तानी मूल के सैयद गुलाम नबी फई और जहीर अहमद अमरीका में गैरकानूनी तरीके से लॉबिंग का काम कर रहे थे। अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई का आरोप है कि दोनों लम्बे समय से अमरीका में साजिश रच रहे हैं और पाकिस्तान सरकार के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। भारत इस बात से अच्छी तरह अवगत है कि पाकिस्तान हर मुमकिन तरीके से भारत विरोधी षड्यंत्र करता रहता है। पश्चिमी देशों, खासकर ब्रिटेन और अमरीका, में कश्मीरी आतंकवादियों को वहां के राजनेता गैर सरकारी संगठनों की आड़ में सरंक्षण और पोषण देते रहे हैं।
कितनी अजीब बात है कि अब भारत के इन दावों को इसलिये गंभीरता से सुना-समझा जायेगा क्योंकि एफबीआई ने उस पर मुहर लगा दी है। एक तरफ तो पाकिस्तानी फौज पर दबाव डालने में आनाकानी और दूसरी तरफ अमरीका में भारत-विरोधी षड्यंत्रकारियों का पर्दाफाश। अमरीका की इस विरोधाभासी नीति को समझे बिना भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर सकता। क्या यह बात आसानी से भुलाई जा सकती है कि अतीत में भारत के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा किये गये कुचक्रों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अमरीका की भी भूमिका रही है।
पाकिस्तान की नीयत में खोट होने के अनगिनत सबूत मिल चुके हैं। आतंकवाद पाकिस्तान का मूल चरित्र है जिसका प्रयोग उसने भारत को डराने और अमरीका को उलझाने के लिये ही किया है। जब तक अमरीका आतंक के सबसे बड़े पोषक देश पाकिस्तान को आतंक के खिलाफ अभियान में सहयोगी मानने की भयंकर भूल करता रहेगा, तब तक भारत से निकटता स्थापित करने के उसके सभी प्रयास आधे-अधूरे एवं अवसरवादी ही माने जायेंगे। अगर अमरीका के कंधों पर नाच रहे पाकिस्तानी हुक्मरानों की अक्ल हमेशा के लिये ठिकाने लगा दी जाये तो एशिया का नेतृत्व भारत के हाथ में देखने की हिलेरी की ख्वाहिश अधूरी नहीं रहेगी।
Sunday, July 24, 2011
अमरीका और पाकिस्तान में फिर तनाव
अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई ने पाकिस्तानी मूल के दो अमरीकी नागरिकों को अमरीका के लॉबिंग कानून का उल्लंघन करने को दोषी ठहराया है। उनमें से एक, गुलाम नबी फई, वाशिंगटन स्थित कश्मीरी अमरीकी काउंसिल (केएसी) चलाता है। फई पर आरोप है कि वह भारतीय कश्मीर में अमरीकी नीति को प्रभावित करने के लिये पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा उपलब्ध कराये गये धन से अमरीकी सांसदों की हथेली गरम करता था। यह गिरफ्तारी बहुत अहम वक्त हुई है। दरअसल इसी महीने के आरंभ में आईएसआई ने एक पाकिस्तानी डॉक्टर शकील अफरीदी को इस आरोप में गिरफ्तार किया कि उसने अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए को एबटाबाद में उस ऑपरेशन में सहयोग किया जिसके जरिये आतंक के सरगना ओसामा बिन लादेन का सफाया किया गया था। तो क्या इसका यह अर्थ लगाया जाये कि अमरीका ने फई को गिरफ्तार कर इस्लामाबाद को संदेश दे दिया है कि अगर वह लक्ष्मण रेखा पार करेगा तो अमरीका भी उन जगहों से वाकिफ हैं जहां दबाने पर पाकिस्तान को सबसे ज्यादा दर्द होता है।
निश्चित तौर पर फई की गिरफ्तारी से अमरीका-पाकिस्तान संबंध एक नए, परन्तु अत्यन्त असहज दौर में प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन यह मानना जल्दबाजी होगा कि अमरीका ने पाकिस्तान की उस दलील को नकारना शुरू कर दिया है कि कश्मीर के सुलझते ही अफगानिस्तान स्वत: सुलझ जायेगा।
निश्चित तौर पर फई की गिरफ्तारी से अमरीका-पाकिस्तान संबंध एक नए, परन्तु अत्यन्त असहज दौर में प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन यह मानना जल्दबाजी होगा कि अमरीका ने पाकिस्तान की उस दलील को नकारना शुरू कर दिया है कि कश्मीर के सुलझते ही अफगानिस्तान स्वत: सुलझ जायेगा।
Sunday, April 24, 2011
खुरासान के आर्य
अफगानिस्तान में पिछले तीन दशक से चल रहे युद्ध की वजह से वहां राज्य की सत्ता चरमरा चुकी है, जबरदस्त भाषाई कलह उत्पन्न हो गयी हैं और राजनीति पर नस्लवाद बुरी तरह हावी हो चुका है। दरअसल तालिबान ने अपने पंचवर्षीय कुशासन में अफगानिस्तान के अत्यन्त नाजुक नस्लीय ताने-बाने को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया था। इस गैर-जिम्मेदाराना शासन के अंत के बाद उन जाति समूहों के दृष्टिकोण को बल मिला जो राजनीतिक रूप से हाशिये पर आये हुए थे। ताजिक उनमें प्रमख हैं जो खुद को आर्य सभ्यता से जोड़ते हैं।
अफगानिस्तान में पश्तूनों की तादाद सबसे ज्यादा है लेकिन ताजिक भी वहां की जनसंख्या का एक-चौथाई हैं। ताजिकों में अब एक आजाद खुरासान राज्य की मांग उठने लगी है। अपने पक्ष में उनकी दलील यह है कि पख्तूनिस्तान की मांग अपने आप में इस बात प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अफगानिस्तान केवल पश्तूनों का ही देश है और बाकी सभी नस्लीय समुदाय को दोयम दर्जे का माना जाता है। गौरतलब है कि खुरासान राष्ट्र के बारे में औपचारिक बहस पिछले महीने काबुल में एक ताजिक नेता सैयद खलिल के अंतिम संस्कार के मौके पर शुरू हुई। राष्ट्रपति हामिद करजई प्रशासन में उपराष्ट्रपति जनरल फाहिम और कुछ मंत्रियों को इस मांग का समर्थक बताया जा रहा है।
अगर इतिहास पर नजर डालें तो खुरासान राज्य का जिक्र मुगलकालीन इतिहास में कई बार होता है। ताजिकों का मानना है कि वर्तमान ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के कई शहर जैसे निशापुर, हेरात, गजनी, काबुल, बाल्ख, समरकन्द, बुखारा एवं खीवा आदि कभी खुरासान का हिस्सा हुआ करते थे। उनका दावा है कि चौथी से नौंवी शताब्दी तक वर्तमान अफगानिस्तान का बड़ा हिस्सा खुरासान में शामिल था जहां ताजिकों का राज कायम था।
हालांकि ताजिक समूहों की इस मांग को फिलहाल व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला है लेकिन इस विवादास्पद मुद्दे पर औपचारिक बहस आरंभ होना भी बहुत बड़ी बात है। अमरीका यह दोहरा चुका है कि 2014 में वह अफगानिस्तान छोडक़र चला जायेगा, इसलिये तालिबान के बर्बर एवं कट्टरपंथी शासन का दंश झेल चुके जातीय अल्पसंख्यकों में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि अफगानिस्तान को खुरासान, पश्तूनिस्तान और हजारिस्तान में बांटने का वक्त आ गया है।
गौरतलब है कि ताजिक केवल अफगानिस्तान में ही नहीं हैं। पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद अस्तित्व में आये मध्य एशियाई गणराज्य ताजिकिस्तान में ताजिकों की आबादी करीब 80 प्रतिशत है। भाषा, संस्कृति और इतिहास के नजरिये से ताजिक ईरान के फारसी बोलने वालों से बहुत नजदीकी से जुड़े हुए हैं। मुख्यत: इस्लामिक होने के बावजूद ताजिकिस्तान ने कट्टरता का मार्ग नहीं अपनाकर धर्मनिरपेक्षता को अपनी बुनियाद बनाया। कुछ साल पहले तो बाकायदा राज्य प्रायोजित एक अभियान चलाकर सभी फारसी बोलने वाले लोगों को प्राचीन आर्यों का वशंज बताया गया। ताजिक सरकार ने तो वर्ष 2006 को आर्य सभ्यता वर्ष के तौर पर मनाया जिसके तहत कई सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया गया। राष्ट्रपति इमोमलि रहमॉन ने मध्य एशियाई सभ्यता के आर्य मूल पर जोर देते हुए कहा कि ताजिकों ने तुर्कों और मंगोलों का डटकर सामना किया है। इस दौरान बैनर और होर्डिंग पर स्वास्तिक प्रदर्शित किया गया जिसे ताजिकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक माना गया।
ताजिक इतिहासकारों के इस दावे में कितना दम है कि सभी ताजिक आर्य मूल के हैं, इसका निर्णय करना आसान नहीं है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आर्यों से खुद को जोडऩे की कोशिशें तो तभी से आंरभ हो गयी थीं जब ब्रितानी हुकूमत ने भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक एकता को खंडित करने के लिये श्वेत वर्ण वाले भारतीयों को पश्चिमी नस्ल के करीब बताया था। बीसवीं शताब्दी में जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने जर्मन जाति को श्रेष्ठ नस्ल यानी आर्य के तौर पर प्रचारित किया था। भारतीय परम्परा के शुभंकर स्वास्तिक के प्रतीक की बिलकुल उलट छवि वाला स्वास्तिक नाजियों ने अपनाकर उसे विवादास्पद बना दिया।
अफगानिस्तान में रहने वाले ताजिकों और ताजिकिस्तान के मध्य अत्यन्त प्रगाढ़ रिश्ते हैं। गौरतलब है कि तालिबान के खिलाफ संघर्ष में नॉर्दर्न एलायंस को ताजिकिस्तान ने भरपूर समर्थन दिया था। भारत ने भी हमेशा अफगानिस्तान के ताजिकों से मधुर सम्बन्ध बनाकर रखे हैं। नॉर्दर्न एलायंस, जो कि मुख्य रूप से ताजिक बाहुल्य संगठन था, के नेता अहमद शाह मसूद को तालिबान से लडऩे में भारत ने अपना पूरा समर्थन दिया था। यह केवल संयोग नहीं है कि ताजिकिस्तान मध्य एशिया में भारत का घनिष्ठतम मित्र है। राजधानी दुशानबे से थोड़ी दूरी पर स्थित ऐनी एयरफील्ड को अपग्रेड करने में भारत ने अहम भूमिका निभाई है।
इसमे कोई संदेह नहीं है कि फिलहाल खुरासान राष्ट्र की मांग का खुलकर समर्थन अफगानिस्तान के किसी भी ताजिक नेता ने नहीं किया है लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि मौजूदा परिस्थितियों में नामुमकिन दिखने वाला खुरासान राष्ट्र भविष्य में कभी अस्तित्व में ही नहीं आ सकेगा। 2014 अब ज्यादा दूर नहीं है, जब अमरीका ने अफगानिस्तान से अपनी फौज हटाने का फैसला लिया है। पाकिस्तान की पूरी कोशिश रहेगी कि अमरीका के हटते ही एक बार फिर वह अफगानिस्तान में सामरिक गहराई हासिल करने की कोशिश करे। हो सकता है कि पश्तूनों की बहुतायत वाला तालिबान फिर से पाकिस्तान के हाथ की कठपुतली बन जाये लेकिन ताजिक ऐसा हरगिज न तो चाहेंगे और न ही होने देंगे। भारत को भी उनका साथ देना होगा।
अफगानिस्तान में पश्तूनों की तादाद सबसे ज्यादा है लेकिन ताजिक भी वहां की जनसंख्या का एक-चौथाई हैं। ताजिकों में अब एक आजाद खुरासान राज्य की मांग उठने लगी है। अपने पक्ष में उनकी दलील यह है कि पख्तूनिस्तान की मांग अपने आप में इस बात प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अफगानिस्तान केवल पश्तूनों का ही देश है और बाकी सभी नस्लीय समुदाय को दोयम दर्जे का माना जाता है। गौरतलब है कि खुरासान राष्ट्र के बारे में औपचारिक बहस पिछले महीने काबुल में एक ताजिक नेता सैयद खलिल के अंतिम संस्कार के मौके पर शुरू हुई। राष्ट्रपति हामिद करजई प्रशासन में उपराष्ट्रपति जनरल फाहिम और कुछ मंत्रियों को इस मांग का समर्थक बताया जा रहा है।
अगर इतिहास पर नजर डालें तो खुरासान राज्य का जिक्र मुगलकालीन इतिहास में कई बार होता है। ताजिकों का मानना है कि वर्तमान ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के कई शहर जैसे निशापुर, हेरात, गजनी, काबुल, बाल्ख, समरकन्द, बुखारा एवं खीवा आदि कभी खुरासान का हिस्सा हुआ करते थे। उनका दावा है कि चौथी से नौंवी शताब्दी तक वर्तमान अफगानिस्तान का बड़ा हिस्सा खुरासान में शामिल था जहां ताजिकों का राज कायम था।
हालांकि ताजिक समूहों की इस मांग को फिलहाल व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला है लेकिन इस विवादास्पद मुद्दे पर औपचारिक बहस आरंभ होना भी बहुत बड़ी बात है। अमरीका यह दोहरा चुका है कि 2014 में वह अफगानिस्तान छोडक़र चला जायेगा, इसलिये तालिबान के बर्बर एवं कट्टरपंथी शासन का दंश झेल चुके जातीय अल्पसंख्यकों में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि अफगानिस्तान को खुरासान, पश्तूनिस्तान और हजारिस्तान में बांटने का वक्त आ गया है।
गौरतलब है कि ताजिक केवल अफगानिस्तान में ही नहीं हैं। पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद अस्तित्व में आये मध्य एशियाई गणराज्य ताजिकिस्तान में ताजिकों की आबादी करीब 80 प्रतिशत है। भाषा, संस्कृति और इतिहास के नजरिये से ताजिक ईरान के फारसी बोलने वालों से बहुत नजदीकी से जुड़े हुए हैं। मुख्यत: इस्लामिक होने के बावजूद ताजिकिस्तान ने कट्टरता का मार्ग नहीं अपनाकर धर्मनिरपेक्षता को अपनी बुनियाद बनाया। कुछ साल पहले तो बाकायदा राज्य प्रायोजित एक अभियान चलाकर सभी फारसी बोलने वाले लोगों को प्राचीन आर्यों का वशंज बताया गया। ताजिक सरकार ने तो वर्ष 2006 को आर्य सभ्यता वर्ष के तौर पर मनाया जिसके तहत कई सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया गया। राष्ट्रपति इमोमलि रहमॉन ने मध्य एशियाई सभ्यता के आर्य मूल पर जोर देते हुए कहा कि ताजिकों ने तुर्कों और मंगोलों का डटकर सामना किया है। इस दौरान बैनर और होर्डिंग पर स्वास्तिक प्रदर्शित किया गया जिसे ताजिकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक माना गया।
ताजिक इतिहासकारों के इस दावे में कितना दम है कि सभी ताजिक आर्य मूल के हैं, इसका निर्णय करना आसान नहीं है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आर्यों से खुद को जोडऩे की कोशिशें तो तभी से आंरभ हो गयी थीं जब ब्रितानी हुकूमत ने भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक एकता को खंडित करने के लिये श्वेत वर्ण वाले भारतीयों को पश्चिमी नस्ल के करीब बताया था। बीसवीं शताब्दी में जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने जर्मन जाति को श्रेष्ठ नस्ल यानी आर्य के तौर पर प्रचारित किया था। भारतीय परम्परा के शुभंकर स्वास्तिक के प्रतीक की बिलकुल उलट छवि वाला स्वास्तिक नाजियों ने अपनाकर उसे विवादास्पद बना दिया।
अफगानिस्तान में रहने वाले ताजिकों और ताजिकिस्तान के मध्य अत्यन्त प्रगाढ़ रिश्ते हैं। गौरतलब है कि तालिबान के खिलाफ संघर्ष में नॉर्दर्न एलायंस को ताजिकिस्तान ने भरपूर समर्थन दिया था। भारत ने भी हमेशा अफगानिस्तान के ताजिकों से मधुर सम्बन्ध बनाकर रखे हैं। नॉर्दर्न एलायंस, जो कि मुख्य रूप से ताजिक बाहुल्य संगठन था, के नेता अहमद शाह मसूद को तालिबान से लडऩे में भारत ने अपना पूरा समर्थन दिया था। यह केवल संयोग नहीं है कि ताजिकिस्तान मध्य एशिया में भारत का घनिष्ठतम मित्र है। राजधानी दुशानबे से थोड़ी दूरी पर स्थित ऐनी एयरफील्ड को अपग्रेड करने में भारत ने अहम भूमिका निभाई है।
इसमे कोई संदेह नहीं है कि फिलहाल खुरासान राष्ट्र की मांग का खुलकर समर्थन अफगानिस्तान के किसी भी ताजिक नेता ने नहीं किया है लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि मौजूदा परिस्थितियों में नामुमकिन दिखने वाला खुरासान राष्ट्र भविष्य में कभी अस्तित्व में ही नहीं आ सकेगा। 2014 अब ज्यादा दूर नहीं है, जब अमरीका ने अफगानिस्तान से अपनी फौज हटाने का फैसला लिया है। पाकिस्तान की पूरी कोशिश रहेगी कि अमरीका के हटते ही एक बार फिर वह अफगानिस्तान में सामरिक गहराई हासिल करने की कोशिश करे। हो सकता है कि पश्तूनों की बहुतायत वाला तालिबान फिर से पाकिस्तान के हाथ की कठपुतली बन जाये लेकिन ताजिक ऐसा हरगिज न तो चाहेंगे और न ही होने देंगे। भारत को भी उनका साथ देना होगा।
Friday, April 15, 2011
Sunday, April 10, 2011
अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा
अगर मीडिया खबरों को सही मानें तो अमेरिका और पाकिस्तान के साझा खुफिया ऑपरेशन जनवरी से ही ठंडे बस्ते में पड़े हैं। वजह सीआईए एजेंट रेमंड डेविस द्वारा लाहौर में किया गया दोहरा हत्याकांड है। हालांकि डेविस को रिहा कर दिया गया लेकिन जिस विवादास्पद परिस्थितियों में उसकी रिहाई हुई, उससे पाकिस्तानी जनमानस, खासकर कट्टरपंथी तत्व, काफी आग-बबूला नजर आये। उसके बाद अमेरिका के ड्रोन हमले में 41 लोग मारे गये, जिसकी पाकिस्तान के सर्वोच्च सैन्य हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। पाकिस्तानी खुफिया संस्थाओं को इस हमले की जानकारी नहीं थी, सेना की कड़ी प्रतिक्रिया अमेरिका की एकतरफा कार्रवाई के प्रति पाकिस्तान के आक्रोशित प्रतिरोध का इजहार था। पिछले दस सालों के दौरान पाकिस्तान में जिहादियों के सफाये के लिये सीआईए को काफी अधिकार हासिल हुए हैं। पाकिस्तान की धरती पर खुफिया गतिविधियों का संचालन कोई नई बात नहीं है लेकिन रेमंड डेविस की गिरफ्तारी के बाद हुए रहस्योद्घाटनों एवं आरोपों-प्रत्यारोपों ने पाकिस्तानी जनता के समक्ष सीआईए की उपस्थिति की हद का खुलासा कर दिया है। 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की उम्मीद लगाये बैठी पाकिस्तानी फौज अफगानिस्तान में अपने प्रभाव का विस्तार करने की जुगाड़ करने में लगी है।
यह तथ्य अमेरिका से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान इस समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसकी जड़ है। पाकिस्तानी सेना चाहे कितना भी क्यों न छटपटाये, वो अमेरिका के चंगुल से नहीं बच सकती। मौजूदा हालात में, जब पाकिस्तान अनेक राजनीतिक और आर्थिक संकटों का सामना कर रहा है, वह अमेरिका को पीठ दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहरे निकलने में पाकिस्तान की मदद की दरकार है और दूसरी ओर पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका की आर्थिक सहायता पर निर्भर है। जाहिर है कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही मददख्वाह भी हैं और मददगार भी। ऐसे में यह अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा।
यह तथ्य अमेरिका से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान इस समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसकी जड़ है। पाकिस्तानी सेना चाहे कितना भी क्यों न छटपटाये, वो अमेरिका के चंगुल से नहीं बच सकती। मौजूदा हालात में, जब पाकिस्तान अनेक राजनीतिक और आर्थिक संकटों का सामना कर रहा है, वह अमेरिका को पीठ दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहरे निकलने में पाकिस्तान की मदद की दरकार है और दूसरी ओर पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका की आर्थिक सहायता पर निर्भर है। जाहिर है कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही मददख्वाह भी हैं और मददगार भी। ऐसे में यह अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा।
कर्जन के ख्याली पुलाव
लॉर्ड कर्जन एक पक्का साम्राज्यवादी था। केवल 38 साल की उम्र में ब्रिटिश भारत का वायसराय बनने वाला कर्जन एक अत्यन्त महत्वाकांक्षी अभिजात था। 1905 में किचनर के साथ ब्रिटिश भारतीय सेना में सुधारों को लेकर हुए मतभेद के कारण विवादास्पद परिस्थितियों में कर्जन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इससे उसके राजनीतिक जीवन की उत्कर्ष यात्रा पर आंषिक विराम अवश्य लगा लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कट्टर हिमायती की उसकी छवि पर कोई आंच नहीं आई। 1914 में द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ होने के साथ ही कर्जन को अपनी प्रतिभाएं दिखाने का सुनहरा मौका मिल गया। वह सरकार में शामिल हो गया। उसकी असली नजर तो विदेश मंत्रालय पर थी। 1917 तक आते-आते कर्जन अति सक्रिय हो उठा और विदेश सचिव का पद हथियाने के लिये दांव-पेंच लड़ाने लगा। इस पद पर उस समय आर्थर बेलफर थे जिनका काम करने का तौर-तरीका कर्जन से काफी अलग था। 1919 में द्वितीय विष्व युद्ध समाप्त हो गया। जब प्रधानमंत्री लायड जॉर्ज के साथ बेलफर पेरिस शांति वार्ता में भाग लेने गये तो कर्जन को कार्यवाहक विदेश सचिव नियुक्त कर दिया गया। कुछ समय बाद जब बेलफर को लॉर्ड प्रेसिडेंट ऑव काउंसिल बनाया गया तो कर्जन को भी विदेश मंत्रालय की पूरी जिम्मेदारी दे दी गई। कर्जन की ख्वाहिश पूरी हो गयी। इसके बाद कर्जन यह सपने पाल बैठा कि वह ब्रिटिश विदेश नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करेगा। ब्रिटिश राजनय का अंतिम नियंता बनने की सनक कर्जन के मन में घर कर चुकी थी। परन्तु कर्जन को घोर निराशा ही हाथ लगी। दुनिया के देशों के साथ ब्रिटेन किस प्रकार के रिश्ते रखे, इस मुद्दे पर कर्जन अन्य मंत्रियों को अपना नेतृत्व स्वीकार कराने में नाकामयाब रहे।
Friday, April 1, 2011
रूसी राजनीति में भूचाल
रूस, लीबिया पर बल प्रयोग का विरोध कर रहा है। रूस के ताकतवर प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन ने लीबिया पर हवाई हमलों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि नागरिकों की रक्षा करने की आड़ में अमरीका पहले भी अफगानिस्तान और इराक में हमले कर चुका है और अब लीबिया की बारी है। जब पुतिन ने गद्दाफी शासन के खिलाफ पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1973 को ‘कू्रसेड’ करार दिया तो वे सख्त शब्दों में रूस के परम्परागत अमरीका विरोधी रवैये को ही उजागर कर रहे थे।
यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने ऐसा फैसला लिया जो रूस की विदेश नीति और प्रधानमंत्री पुतिन के साथ उनके रिश्तों को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। मेदवेदेव ने उस रूसी राजनयिक को अफ्रीकी देशों के लिये विशेष दूत नियुक्त कर दिया जो गद्दाफी शासन के कड़े आलोचक हैं। नये रूसी दूत गद्दाफी को ‘शैतानी कर्नल’ मानते हैं। मेदवेदेव का यह निर्णय इस बात का संकेत देता है कि वे अपने प्रधानमंत्री की इच्छाओं के विपरीत पश्चिमी देशों से नजदीकी रिश्ते कायम करने के इच्छुक हैं।
मेदवेदेव यहीं पर विराम लगा लेते तो सवाल कम उठते क्योंकि इससे पहले भी कई आतंरिक मुद्दों पर उन्होंने दबे स्वर में पुतिन पर निशाना साधा है। लेकिन लीबिया पर पुतिन के बयान की आलोचना कर उन्होंने रूस की आतंरिक राजनीति में भूकंप ला दिया। पुतिन के बयान की आलोचना करते समय हालांकि मेदवेदेव ने पुतिन का नाम नहीं लिया लेकिन पुतिन द्वारा प्रयुक्त कू्रसेड जैसे शब्दों को नाकाबिले बर्दाश्त करार देकर मेदवेदेव ने अमरीका को आश्चर्यजनक प्रसन्नता प्रदान कर दी है। यह सर्वविदित है कि अमरीका, पुतिन की तुलना में मेदवेदेव को ज्यादा तरजीह देता है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मौका नहीं चूके और पुतिन के घाव पर नमक छिडक़ते हुए उन्होंने लीबिया के मसले पर मेदवेदेव के बयान पर खुशी जाहिर की है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही रूस में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नीतिगत मतभेद कभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। मेदवेदेव के इस अप्रत्याशित कदम के बाद रूसी राजनीति का वह पहलू जो बहुत धुंधला नजर आता था, पूरी तरह साफ हो चुका है। दरअसल सारा झगड़ा अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर है। नि:संदेह पुतिन रूसी राजनीति में न केवल सबसे ताकतवर हैं बल्कि सर्वाधिक लोकप्रिय भी हैं। रूस के संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत अब उनके राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे में भी कोई अड़चन नहीं है। पुतिन की कोशिश रूसी राष्ट्रवादियों के मन में गहरी जड़ें जमाने की है, वहीं मेदवेदेव के प्रयास पश्चिमी जगत का सम्मान-समर्थन पाने की अभिलाषा प्रतिबिंबित करते हैं।
रूसियों के बीच मेदवेदेव द्वारा खुद को ‘उदारवादी जार’ के तौर पर पेश करने के प्रयासों का कामयाब होना संदेहास्पद लगता है। पूर्व सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गॉर्बाचेव द्वारा हाल ही में अपने 80 वें जन्मदिवस सम्मान समारोह के अवसर पर मेदवेदेव की उपस्थिति में पुतिन को दी गई यह नसीहत कि उन्हें 2012 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लडऩा चाहिये, ज्यादा असरदार नहीं हो पायेगी। दिसंबर से पहले पुतिन और मेदवेदेव को आपस में यह तय करना है कि दोनों में से कौन राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेगा। लेकिन मेदवेदेव इस सच्चाई से भी भली-भांति वाकिफ हैं कि अंतिम रूप से यह पुतिन ही तय करेंगे कि चुनाव कौन लड़ेगा? जैसा कि रूस के बारे में अक्सर कहा जाता है कि एक वक्त में केवल एक ही जार शासन करता है।
यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने ऐसा फैसला लिया जो रूस की विदेश नीति और प्रधानमंत्री पुतिन के साथ उनके रिश्तों को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। मेदवेदेव ने उस रूसी राजनयिक को अफ्रीकी देशों के लिये विशेष दूत नियुक्त कर दिया जो गद्दाफी शासन के कड़े आलोचक हैं। नये रूसी दूत गद्दाफी को ‘शैतानी कर्नल’ मानते हैं। मेदवेदेव का यह निर्णय इस बात का संकेत देता है कि वे अपने प्रधानमंत्री की इच्छाओं के विपरीत पश्चिमी देशों से नजदीकी रिश्ते कायम करने के इच्छुक हैं।
मेदवेदेव यहीं पर विराम लगा लेते तो सवाल कम उठते क्योंकि इससे पहले भी कई आतंरिक मुद्दों पर उन्होंने दबे स्वर में पुतिन पर निशाना साधा है। लेकिन लीबिया पर पुतिन के बयान की आलोचना कर उन्होंने रूस की आतंरिक राजनीति में भूकंप ला दिया। पुतिन के बयान की आलोचना करते समय हालांकि मेदवेदेव ने पुतिन का नाम नहीं लिया लेकिन पुतिन द्वारा प्रयुक्त कू्रसेड जैसे शब्दों को नाकाबिले बर्दाश्त करार देकर मेदवेदेव ने अमरीका को आश्चर्यजनक प्रसन्नता प्रदान कर दी है। यह सर्वविदित है कि अमरीका, पुतिन की तुलना में मेदवेदेव को ज्यादा तरजीह देता है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मौका नहीं चूके और पुतिन के घाव पर नमक छिडक़ते हुए उन्होंने लीबिया के मसले पर मेदवेदेव के बयान पर खुशी जाहिर की है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही रूस में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नीतिगत मतभेद कभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। मेदवेदेव के इस अप्रत्याशित कदम के बाद रूसी राजनीति का वह पहलू जो बहुत धुंधला नजर आता था, पूरी तरह साफ हो चुका है। दरअसल सारा झगड़ा अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर है। नि:संदेह पुतिन रूसी राजनीति में न केवल सबसे ताकतवर हैं बल्कि सर्वाधिक लोकप्रिय भी हैं। रूस के संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत अब उनके राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे में भी कोई अड़चन नहीं है। पुतिन की कोशिश रूसी राष्ट्रवादियों के मन में गहरी जड़ें जमाने की है, वहीं मेदवेदेव के प्रयास पश्चिमी जगत का सम्मान-समर्थन पाने की अभिलाषा प्रतिबिंबित करते हैं।
रूसियों के बीच मेदवेदेव द्वारा खुद को ‘उदारवादी जार’ के तौर पर पेश करने के प्रयासों का कामयाब होना संदेहास्पद लगता है। पूर्व सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गॉर्बाचेव द्वारा हाल ही में अपने 80 वें जन्मदिवस सम्मान समारोह के अवसर पर मेदवेदेव की उपस्थिति में पुतिन को दी गई यह नसीहत कि उन्हें 2012 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लडऩा चाहिये, ज्यादा असरदार नहीं हो पायेगी। दिसंबर से पहले पुतिन और मेदवेदेव को आपस में यह तय करना है कि दोनों में से कौन राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेगा। लेकिन मेदवेदेव इस सच्चाई से भी भली-भांति वाकिफ हैं कि अंतिम रूप से यह पुतिन ही तय करेंगे कि चुनाव कौन लड़ेगा? जैसा कि रूस के बारे में अक्सर कहा जाता है कि एक वक्त में केवल एक ही जार शासन करता है।
Sunday, March 27, 2011
दोहरे मापदंड
इसमें किसी को शक नहीं है कि कर्नल गद्दाफी ने अपनी ही जनता के विरूद्ध अमानवीय अत्याचार किये हैं। लीबिया के हर घर से सरकार विरोधियों का सफाया करने की धमकियां गद्दाफी कई बार दे चुके हैं। परन्तु लीबिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के माध्यम से वहां शांति और लोकतंत्र कायम हो सकेगा, इसकी उम्मीद करना बेमानी होगा। दुनिया धीरे-धीरे यह समझ रही है कि पश्चिमी देशों ने अपने हित संवर्धन के लिये लीबिया में वही किया है जो पहले अफगानिस्तान और इराक में किया गया था। लीबिया के नागरिकों को गद्दाफी के कहर से बचाने की पश्चिमी देशों की दलीलें आकर्षक जरूर हैं लेकिन खोखली भी हैं। अगर जनता की रक्षा ही हस्तक्षेप का कारण है तो बहरीन और यमन पर पश्चिमी देशों की आपराधिक खामोशी की क्या वजह है, जहां लोकतांत्रिक क्रांति को बेरहमी से कुचल जा रहा है। दरअसल बहरीन और यमन में दोहरे मापदंड इसलिये अपनाये जा रहे हैं क्योंकि वहां के सत्तारूढ़ तानाशाहों की हैसियत अमरीका की कठपुतलियों से ज्यादा नहीं हैं।
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