Saturday, August 6, 2011

चीन में जिहादी आतंक

डॉ विनय कौडा
‘हिन्द महासागर से गहरी और हिमालय से ऊंची’ दोस्ती का दम भरने वाले पाकिस्तान और चीन के रिश्ते इतने कमजोर नहीं हैं कि उनमें आसानी से दरार आ सके। इसलिये यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा कि जिनजियांग में उइगर अलगाववाद के तार पाकिस्तान से जुड़े होने के अकाट्य प्रमाण सामने आने के बाद चीन की आंखों से पाकिस्तान-परस्ती का चश्मा उतर जायेगा। अब तक तो केवल भारत और अमरीका ही पाकिस्तान पर इस बात के लिये दबाव बनाते आये हैं कि वह अपनी जमीन को जिहादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने से रोकने के लिये सख्त से सख्त कदम उठाये, लेकिन पाकिस्तानी हुक्मरानों की कान पर जूं तक नहीं रेंगती। क्या चीन द्वारा पाकिस्तानी पर अपने कबायली इलाकों से नापाक गतिविधियां चलाने वाले उइगर आतंकी समूहों पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाने से पाकिस्तानी सेना की नींद खुलेगी?
चीन को इसमें कोई संदेह नहीं है कि शिनजियांग प्रांत में जुलाई में होने वाले आतंकवादी हमलों की जड़ें पाकिस्तान के आतंकी कारखानों तक फैली हैं। चीन की असहजता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अनमने मन से उसे अपने घनिष्ट मित्र पाकिस्तान को इसके लिये जिम्मेदार ठहराना पड़ा। हालांकि इस आरोप के बाद चीन ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को अपना साथी बताते हुए पाकिस्तान की सराहना करने में भी ज्यादा देर नहीं लगायी। बुनियादी सवाल यह है कि क्या चीन के आरोप भारत के उस तर्क की पुष्टि नहीं करते हैं कि पाकिस्तानी सेना की देखरेख में ही आतंकी शिविर चल रहे हैं। चीन ने कभी भी भारत के आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया। जब मौका मिला तो पाकिस्तान की तरफदारी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। आज जब पाक-प्रशिक्षित उइगर आतंकियों ने चीन की धरती को लहूलुहान करना आंरभ कर दिया है तो चीन के रवैये में बदलाव क्यों आया? क्या आतंक को प्रश्रय देने के संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर चीन पहले अनजान था?
चीन अपनी संप्रभुता को मिलने वाली चुनौतियों पर बहुत ज्यादा संवेदनशील और आशंकित रहता है। इस मामले में उसकी सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान में कार्यरत चीनी नागरिकों के जीवन पर मडंराता खतरा है। ऐसा देखने में आया है कि वहां चीनी नागरिकों पर कई बार हमले हो चुके हैं। इसके अलावा चीन को यह बात काफी समय से अखर रही है कि इस्लामिक मूवमेंट ऑफ ईस्ट तुर्किस्तान (आईएमईटी) से संबंधित उइगर आतंकियों के विरु द्ध ठोस कार्रवाई करने में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां या तो नाकाम रही हैं या फिर अनिच्छुक।
पाकिस्तान भी चीन की चिंताओं के प्रति अधिक संवेदनशील है, क्योंकि पाकिस्तानी हुक्मरान चीन को नाराज करने की सामरिक कीमत से पूरी तरह वाकिफ हैं। स्मरण रहे कि जनरल परवेज मुशर्रफ इस्लामाबाद की प्रख्यात लाल मसजिद पर कब्जा जमाने वाले तालिबान कट्टरपंथियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से परहेज करते रहे लेकिन छह चीनी महिलाओं के अपहरण के बाद चीन की ओर से पाकिस्तान पर पड़े दबाव की वजह से उन्हें लाल मसजिद में कमांडो कार्रवाई का आदेश देना पड़ा। नई गिलानी सरकार भी चीन की चापलूसी में किसी मायने में परवेज मुशर्रफ से कम नहीं है। गृहमंत्री रहमान मलिक ने अपनी सरकार के सत्तारूढ़ होने के एक साल बाद बीजिंग यात्रा में यह कहा था कि चीन के दुश्मन पाकिस्तान के दुश्मन हैं।
आगे चर्चा करने से पहले शिनजियांग प्रान्त और उइगरों के बारे में जानना जरूरी है। चीन के पश्चिमी प्रान्त शिनजियांग की सीमा भारत, पाकिस्तान, किरगिजस्तान, उज्बेकिस्तान और मंगोलिया को स्पर्श करती है। करीब 16 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला शिनजियांग प्रांत चीन के कुल भू-भाग का 17 प्रतिशत है और उसकी आबादी करीब दो करोड़ है। वैसे तो यहां तीन दर्जन से भी ज्यादा जाति समूह के लोग निवास करते हैं, परन्तु 45 प्रतिशत उइगर लोगों का यहां बहुमत है।
उइगर लोग इस्लाम को मानने वाले हैं। शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों की विशाल आबादी चीन की नजरों में हमेशा खटकती रही है। उसे उइगर मुसलमानों की राष्ट्रभक्ति को लेकर हमेशा संदेह रहा है। पिछले छह दशक के दौरान चीनी सरकार ने हान वंश के पक्ष में जो नीतियां अपनायी, उसके कारण उइगर लोग हर दृष्टि से कमजोर होते चले गये। गैर-उइगरों की तादाद 55 प्रतिशत होने से उइगर अपने ही घर पर अल्पसंख्यक हो गये। तिब्बत की ही भांति शिनजियांग में भी चीन की प्रमुख जाति हान को साम्यवादी सरकार ने योजनाबद्ध तरीके से बड़ी संख्या में बसा दिया जिससे वे शिनजियांग के मालिक बन गये हैं।
स्थानीय प्रशासन में उइगरों का प्रतिनिधित्व नाममात्र का है। नस्लीय, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई और रहन-सहन के लिहाज से उइगरों और हान वंशियों में जमीन-आसमान का अंतर है। उच्च पदों और प्राकृतिक संसाधनों पर हान लोगों का कब्जा होने के कारण उनका जीवन स्तर बहुत उंचा हो गया है, जबकि उइगर जाति दयनीय दशाओं में जीवन जीने को अभिशप्त हैं। यह नहीं भूलना चाहिये कि हर जाति समूह को अपनी भाषा, संस्कृति और धर्म से बेहद लगाव होता होता है और इन मुद्दों में वह अनावश्यक हस्तक्षेप आसानी से बर्दाश्त नहीं करता है। अवसर की समानता, भावनात्मक सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं का घोर अभाव ही घनघोर असंतोष को जन्म देता है। उइगर मुसलमानों को अपनी सभ्यता-संस्कृति की चिंता सता रही है और वे स्वायतता की मांग कर रहे हैं।
सामाजिक-आर्थिक विषमता के अलावा उइगरों की भावनाओं को भडक़ाने में ऐतिहासिक तथ्यों की भी भूमिका रही है। यह बात जगजाहिर है कि चीन की उत्तरी और पश्चिमी सीमा पर स्थित तिब्बत, मंगोलिया और शिनजियांग कुछ ऐसे प्रदेश हैं जिन पर चीन का स्थायी कब्जा नहीं रह पाया। पिछली शताब्दी में दो बार शिनजियांग, चीन के हाथ से फिसलकर ‘पूर्वी तुर्किस्तान का इस्लामी गणराज्य’ बन गया था लेकिन माओ की लाल क्रांति के बाद चीन ने उसे फिर से हथिया लिया। चीन की साम्यवादी सरकार अपने विरुद्ध उठे किसी भी विद्रोह का दमन किस बेरहमी से करती है, इसका उल्लेख करने की जरूरत नहीं है। शिनजियांग के उइगरों पर भी चीन ने बहुत कहर ढ़ाया। लेकिन उइगर लोगों में आजादी की लालसा समय-समय पर जोर मारती रहती है।
इस पृष्टभूमि में पाकिस्तान की भूमिका प्रबल हो जाती है। पाकिस्तान में जिहादी आतंकवाद के फलने-फूलने के बाद से ही उइगर आतंकियों का जोश सातवें आसमान पर है। चूंकि उइगर लोग मुसलमान हैं तो पाकिस्तान के जिहादियों-कट्टरपंथियों में उइगरों के लिये विशेष सहानुभूति होना स्वाभाविक है। शिनजियांग के उइगुर मुसलमानों को पाकिस्तान में अल-कायदा और अन्य सहयोगी आतंकी संगठनों द्वारा आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिसका सबूत अमरीकी फौज द्वारा उत्तरी वजीरिस्तान से उइगरों की गिरफ्तारी से भी मिला था। उइगुरों को पाकिस्तान से संचालित वैश्विक जिहादी नेटवर्क का समर्थन मिलना चीन की सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। चीन ने अभी अपना सारा ध्यान पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामी आंदोलन नामक आतंकी संगठन पर केन्द्रित कर दिया है जो शिनजियांग के उइगरों को भडक़ाने-उकसाने में जुटा है। इस संगठन की गतिविधियों का मुख्य केंद्र पाकिस्तान और अफगानिस्तान से जुड़े सीमावर्ती इलाकों में है।
इस साल मई के आरंभ में जब एबटाबाद में जब वैश्विक जिहाद के मसीहा ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने मार गिराया तो वीटो शक्तिधारी देशों में केवल चीन ही वह देश था जिसने पाकिस्तान को दुनिया की आलोचना से बचाया। चीन ने पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी जताते हुए यहां तक कह दिया था कि पाकिस्तान पर होने वाले किसी भी हमले को वह अपने खिलाफ कार्रवाई मानेगा। चीन भले ही यह बात खुले तौर पर स्वीकार न करे लेकिन सच्चाई तो यही है कि जिहादी आतंकवाद ने जिस तरह चीन में दस्तक दी है, वो चीन द्वारा आंख मूंदकर पाकिस्तान की पीठ थपथपाने का ही नतीजा है। आतंक के इस खौफनाक अवतार से चीन भी अछूता नहीं रहा है।
शिनजियांग में भडक़ रही जिहादी हिंसा के लिये पाकिस्तान पर अंगुली उठाकर चीन ने साफ तौर पर पाकिस्तानी हुक्मरानों को बता दिया है कि वह अपनी संप्रभुता की कीमत पर कोई दोस्ती नहीं गांठता और आतंकियों पर लगाम कसने में कोताही बरतने का खामियाजा पाकिस्तान को ही भरना पड़ेगा। आतंकवादियों को ‘गैर-राज्यीय तत्व’ करार देने की पाकिस्तानी दलीलों का चीन पर कोई असर नहीं होगा। आज जब अमरीका-पाकिस्तान संबंध बेहद तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं, पाकिस्तान के लिये चीन के साथ संबंध सबसे महत्वपूर्ण हैं। चीन द्वारा उइगर आतंकियों के पाकिस्तान में प्रशिक्षण की बात कहे जाने के बाद आईएसआई प्रमुख अहमद शुजा पाशा ने बीजिंग पहुंचकर चीन की शिकायतों को दूर करने में देर नहीं लगायी। वैसे चीन भी अच्छी तरह जानता है कि सामरिक रूप से पाकिस्तान उसके लिये बहुत अहमियत रखता है। तभी तो फटकार लगाते ही पुचकार लिया।