अफगानिस्तान में पिछले तीन दशक से चल रहे युद्ध की वजह से वहां राज्य की सत्ता चरमरा चुकी है, जबरदस्त भाषाई कलह उत्पन्न हो गयी हैं और राजनीति पर नस्लवाद बुरी तरह हावी हो चुका है। दरअसल तालिबान ने अपने पंचवर्षीय कुशासन में अफगानिस्तान के अत्यन्त नाजुक नस्लीय ताने-बाने को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया था। इस गैर-जिम्मेदाराना शासन के अंत के बाद उन जाति समूहों के दृष्टिकोण को बल मिला जो राजनीतिक रूप से हाशिये पर आये हुए थे। ताजिक उनमें प्रमख हैं जो खुद को आर्य सभ्यता से जोड़ते हैं।
अफगानिस्तान में पश्तूनों की तादाद सबसे ज्यादा है लेकिन ताजिक भी वहां की जनसंख्या का एक-चौथाई हैं। ताजिकों में अब एक आजाद खुरासान राज्य की मांग उठने लगी है। अपने पक्ष में उनकी दलील यह है कि पख्तूनिस्तान की मांग अपने आप में इस बात प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अफगानिस्तान केवल पश्तूनों का ही देश है और बाकी सभी नस्लीय समुदाय को दोयम दर्जे का माना जाता है। गौरतलब है कि खुरासान राष्ट्र के बारे में औपचारिक बहस पिछले महीने काबुल में एक ताजिक नेता सैयद खलिल के अंतिम संस्कार के मौके पर शुरू हुई। राष्ट्रपति हामिद करजई प्रशासन में उपराष्ट्रपति जनरल फाहिम और कुछ मंत्रियों को इस मांग का समर्थक बताया जा रहा है।
अगर इतिहास पर नजर डालें तो खुरासान राज्य का जिक्र मुगलकालीन इतिहास में कई बार होता है। ताजिकों का मानना है कि वर्तमान ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के कई शहर जैसे निशापुर, हेरात, गजनी, काबुल, बाल्ख, समरकन्द, बुखारा एवं खीवा आदि कभी खुरासान का हिस्सा हुआ करते थे। उनका दावा है कि चौथी से नौंवी शताब्दी तक वर्तमान अफगानिस्तान का बड़ा हिस्सा खुरासान में शामिल था जहां ताजिकों का राज कायम था।
हालांकि ताजिक समूहों की इस मांग को फिलहाल व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला है लेकिन इस विवादास्पद मुद्दे पर औपचारिक बहस आरंभ होना भी बहुत बड़ी बात है। अमरीका यह दोहरा चुका है कि 2014 में वह अफगानिस्तान छोडक़र चला जायेगा, इसलिये तालिबान के बर्बर एवं कट्टरपंथी शासन का दंश झेल चुके जातीय अल्पसंख्यकों में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि अफगानिस्तान को खुरासान, पश्तूनिस्तान और हजारिस्तान में बांटने का वक्त आ गया है।
गौरतलब है कि ताजिक केवल अफगानिस्तान में ही नहीं हैं। पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद अस्तित्व में आये मध्य एशियाई गणराज्य ताजिकिस्तान में ताजिकों की आबादी करीब 80 प्रतिशत है। भाषा, संस्कृति और इतिहास के नजरिये से ताजिक ईरान के फारसी बोलने वालों से बहुत नजदीकी से जुड़े हुए हैं। मुख्यत: इस्लामिक होने के बावजूद ताजिकिस्तान ने कट्टरता का मार्ग नहीं अपनाकर धर्मनिरपेक्षता को अपनी बुनियाद बनाया। कुछ साल पहले तो बाकायदा राज्य प्रायोजित एक अभियान चलाकर सभी फारसी बोलने वाले लोगों को प्राचीन आर्यों का वशंज बताया गया। ताजिक सरकार ने तो वर्ष 2006 को आर्य सभ्यता वर्ष के तौर पर मनाया जिसके तहत कई सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया गया। राष्ट्रपति इमोमलि रहमॉन ने मध्य एशियाई सभ्यता के आर्य मूल पर जोर देते हुए कहा कि ताजिकों ने तुर्कों और मंगोलों का डटकर सामना किया है। इस दौरान बैनर और होर्डिंग पर स्वास्तिक प्रदर्शित किया गया जिसे ताजिकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक माना गया।
ताजिक इतिहासकारों के इस दावे में कितना दम है कि सभी ताजिक आर्य मूल के हैं, इसका निर्णय करना आसान नहीं है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आर्यों से खुद को जोडऩे की कोशिशें तो तभी से आंरभ हो गयी थीं जब ब्रितानी हुकूमत ने भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक एकता को खंडित करने के लिये श्वेत वर्ण वाले भारतीयों को पश्चिमी नस्ल के करीब बताया था। बीसवीं शताब्दी में जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने जर्मन जाति को श्रेष्ठ नस्ल यानी आर्य के तौर पर प्रचारित किया था। भारतीय परम्परा के शुभंकर स्वास्तिक के प्रतीक की बिलकुल उलट छवि वाला स्वास्तिक नाजियों ने अपनाकर उसे विवादास्पद बना दिया।
अफगानिस्तान में रहने वाले ताजिकों और ताजिकिस्तान के मध्य अत्यन्त प्रगाढ़ रिश्ते हैं। गौरतलब है कि तालिबान के खिलाफ संघर्ष में नॉर्दर्न एलायंस को ताजिकिस्तान ने भरपूर समर्थन दिया था। भारत ने भी हमेशा अफगानिस्तान के ताजिकों से मधुर सम्बन्ध बनाकर रखे हैं। नॉर्दर्न एलायंस, जो कि मुख्य रूप से ताजिक बाहुल्य संगठन था, के नेता अहमद शाह मसूद को तालिबान से लडऩे में भारत ने अपना पूरा समर्थन दिया था। यह केवल संयोग नहीं है कि ताजिकिस्तान मध्य एशिया में भारत का घनिष्ठतम मित्र है। राजधानी दुशानबे से थोड़ी दूरी पर स्थित ऐनी एयरफील्ड को अपग्रेड करने में भारत ने अहम भूमिका निभाई है।
इसमे कोई संदेह नहीं है कि फिलहाल खुरासान राष्ट्र की मांग का खुलकर समर्थन अफगानिस्तान के किसी भी ताजिक नेता ने नहीं किया है लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि मौजूदा परिस्थितियों में नामुमकिन दिखने वाला खुरासान राष्ट्र भविष्य में कभी अस्तित्व में ही नहीं आ सकेगा। 2014 अब ज्यादा दूर नहीं है, जब अमरीका ने अफगानिस्तान से अपनी फौज हटाने का फैसला लिया है। पाकिस्तान की पूरी कोशिश रहेगी कि अमरीका के हटते ही एक बार फिर वह अफगानिस्तान में सामरिक गहराई हासिल करने की कोशिश करे। हो सकता है कि पश्तूनों की बहुतायत वाला तालिबान फिर से पाकिस्तान के हाथ की कठपुतली बन जाये लेकिन ताजिक ऐसा हरगिज न तो चाहेंगे और न ही होने देंगे। भारत को भी उनका साथ देना होगा।
Sunday, April 24, 2011
Friday, April 15, 2011
Sunday, April 10, 2011
अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा
अगर मीडिया खबरों को सही मानें तो अमेरिका और पाकिस्तान के साझा खुफिया ऑपरेशन जनवरी से ही ठंडे बस्ते में पड़े हैं। वजह सीआईए एजेंट रेमंड डेविस द्वारा लाहौर में किया गया दोहरा हत्याकांड है। हालांकि डेविस को रिहा कर दिया गया लेकिन जिस विवादास्पद परिस्थितियों में उसकी रिहाई हुई, उससे पाकिस्तानी जनमानस, खासकर कट्टरपंथी तत्व, काफी आग-बबूला नजर आये। उसके बाद अमेरिका के ड्रोन हमले में 41 लोग मारे गये, जिसकी पाकिस्तान के सर्वोच्च सैन्य हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। पाकिस्तानी खुफिया संस्थाओं को इस हमले की जानकारी नहीं थी, सेना की कड़ी प्रतिक्रिया अमेरिका की एकतरफा कार्रवाई के प्रति पाकिस्तान के आक्रोशित प्रतिरोध का इजहार था। पिछले दस सालों के दौरान पाकिस्तान में जिहादियों के सफाये के लिये सीआईए को काफी अधिकार हासिल हुए हैं। पाकिस्तान की धरती पर खुफिया गतिविधियों का संचालन कोई नई बात नहीं है लेकिन रेमंड डेविस की गिरफ्तारी के बाद हुए रहस्योद्घाटनों एवं आरोपों-प्रत्यारोपों ने पाकिस्तानी जनता के समक्ष सीआईए की उपस्थिति की हद का खुलासा कर दिया है। 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की उम्मीद लगाये बैठी पाकिस्तानी फौज अफगानिस्तान में अपने प्रभाव का विस्तार करने की जुगाड़ करने में लगी है।
यह तथ्य अमेरिका से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान इस समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसकी जड़ है। पाकिस्तानी सेना चाहे कितना भी क्यों न छटपटाये, वो अमेरिका के चंगुल से नहीं बच सकती। मौजूदा हालात में, जब पाकिस्तान अनेक राजनीतिक और आर्थिक संकटों का सामना कर रहा है, वह अमेरिका को पीठ दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहरे निकलने में पाकिस्तान की मदद की दरकार है और दूसरी ओर पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका की आर्थिक सहायता पर निर्भर है। जाहिर है कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही मददख्वाह भी हैं और मददगार भी। ऐसे में यह अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा।
यह तथ्य अमेरिका से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान इस समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसकी जड़ है। पाकिस्तानी सेना चाहे कितना भी क्यों न छटपटाये, वो अमेरिका के चंगुल से नहीं बच सकती। मौजूदा हालात में, जब पाकिस्तान अनेक राजनीतिक और आर्थिक संकटों का सामना कर रहा है, वह अमेरिका को पीठ दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहरे निकलने में पाकिस्तान की मदद की दरकार है और दूसरी ओर पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका की आर्थिक सहायता पर निर्भर है। जाहिर है कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही मददख्वाह भी हैं और मददगार भी। ऐसे में यह अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा।
कर्जन के ख्याली पुलाव
लॉर्ड कर्जन एक पक्का साम्राज्यवादी था। केवल 38 साल की उम्र में ब्रिटिश भारत का वायसराय बनने वाला कर्जन एक अत्यन्त महत्वाकांक्षी अभिजात था। 1905 में किचनर के साथ ब्रिटिश भारतीय सेना में सुधारों को लेकर हुए मतभेद के कारण विवादास्पद परिस्थितियों में कर्जन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इससे उसके राजनीतिक जीवन की उत्कर्ष यात्रा पर आंषिक विराम अवश्य लगा लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कट्टर हिमायती की उसकी छवि पर कोई आंच नहीं आई। 1914 में द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ होने के साथ ही कर्जन को अपनी प्रतिभाएं दिखाने का सुनहरा मौका मिल गया। वह सरकार में शामिल हो गया। उसकी असली नजर तो विदेश मंत्रालय पर थी। 1917 तक आते-आते कर्जन अति सक्रिय हो उठा और विदेश सचिव का पद हथियाने के लिये दांव-पेंच लड़ाने लगा। इस पद पर उस समय आर्थर बेलफर थे जिनका काम करने का तौर-तरीका कर्जन से काफी अलग था। 1919 में द्वितीय विष्व युद्ध समाप्त हो गया। जब प्रधानमंत्री लायड जॉर्ज के साथ बेलफर पेरिस शांति वार्ता में भाग लेने गये तो कर्जन को कार्यवाहक विदेश सचिव नियुक्त कर दिया गया। कुछ समय बाद जब बेलफर को लॉर्ड प्रेसिडेंट ऑव काउंसिल बनाया गया तो कर्जन को भी विदेश मंत्रालय की पूरी जिम्मेदारी दे दी गई। कर्जन की ख्वाहिश पूरी हो गयी। इसके बाद कर्जन यह सपने पाल बैठा कि वह ब्रिटिश विदेश नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करेगा। ब्रिटिश राजनय का अंतिम नियंता बनने की सनक कर्जन के मन में घर कर चुकी थी। परन्तु कर्जन को घोर निराशा ही हाथ लगी। दुनिया के देशों के साथ ब्रिटेन किस प्रकार के रिश्ते रखे, इस मुद्दे पर कर्जन अन्य मंत्रियों को अपना नेतृत्व स्वीकार कराने में नाकामयाब रहे।
Friday, April 1, 2011
रूसी राजनीति में भूचाल
रूस, लीबिया पर बल प्रयोग का विरोध कर रहा है। रूस के ताकतवर प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन ने लीबिया पर हवाई हमलों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि नागरिकों की रक्षा करने की आड़ में अमरीका पहले भी अफगानिस्तान और इराक में हमले कर चुका है और अब लीबिया की बारी है। जब पुतिन ने गद्दाफी शासन के खिलाफ पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1973 को ‘कू्रसेड’ करार दिया तो वे सख्त शब्दों में रूस के परम्परागत अमरीका विरोधी रवैये को ही उजागर कर रहे थे।
यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने ऐसा फैसला लिया जो रूस की विदेश नीति और प्रधानमंत्री पुतिन के साथ उनके रिश्तों को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। मेदवेदेव ने उस रूसी राजनयिक को अफ्रीकी देशों के लिये विशेष दूत नियुक्त कर दिया जो गद्दाफी शासन के कड़े आलोचक हैं। नये रूसी दूत गद्दाफी को ‘शैतानी कर्नल’ मानते हैं। मेदवेदेव का यह निर्णय इस बात का संकेत देता है कि वे अपने प्रधानमंत्री की इच्छाओं के विपरीत पश्चिमी देशों से नजदीकी रिश्ते कायम करने के इच्छुक हैं।
मेदवेदेव यहीं पर विराम लगा लेते तो सवाल कम उठते क्योंकि इससे पहले भी कई आतंरिक मुद्दों पर उन्होंने दबे स्वर में पुतिन पर निशाना साधा है। लेकिन लीबिया पर पुतिन के बयान की आलोचना कर उन्होंने रूस की आतंरिक राजनीति में भूकंप ला दिया। पुतिन के बयान की आलोचना करते समय हालांकि मेदवेदेव ने पुतिन का नाम नहीं लिया लेकिन पुतिन द्वारा प्रयुक्त कू्रसेड जैसे शब्दों को नाकाबिले बर्दाश्त करार देकर मेदवेदेव ने अमरीका को आश्चर्यजनक प्रसन्नता प्रदान कर दी है। यह सर्वविदित है कि अमरीका, पुतिन की तुलना में मेदवेदेव को ज्यादा तरजीह देता है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मौका नहीं चूके और पुतिन के घाव पर नमक छिडक़ते हुए उन्होंने लीबिया के मसले पर मेदवेदेव के बयान पर खुशी जाहिर की है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही रूस में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नीतिगत मतभेद कभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। मेदवेदेव के इस अप्रत्याशित कदम के बाद रूसी राजनीति का वह पहलू जो बहुत धुंधला नजर आता था, पूरी तरह साफ हो चुका है। दरअसल सारा झगड़ा अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर है। नि:संदेह पुतिन रूसी राजनीति में न केवल सबसे ताकतवर हैं बल्कि सर्वाधिक लोकप्रिय भी हैं। रूस के संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत अब उनके राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे में भी कोई अड़चन नहीं है। पुतिन की कोशिश रूसी राष्ट्रवादियों के मन में गहरी जड़ें जमाने की है, वहीं मेदवेदेव के प्रयास पश्चिमी जगत का सम्मान-समर्थन पाने की अभिलाषा प्रतिबिंबित करते हैं।
रूसियों के बीच मेदवेदेव द्वारा खुद को ‘उदारवादी जार’ के तौर पर पेश करने के प्रयासों का कामयाब होना संदेहास्पद लगता है। पूर्व सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गॉर्बाचेव द्वारा हाल ही में अपने 80 वें जन्मदिवस सम्मान समारोह के अवसर पर मेदवेदेव की उपस्थिति में पुतिन को दी गई यह नसीहत कि उन्हें 2012 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लडऩा चाहिये, ज्यादा असरदार नहीं हो पायेगी। दिसंबर से पहले पुतिन और मेदवेदेव को आपस में यह तय करना है कि दोनों में से कौन राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेगा। लेकिन मेदवेदेव इस सच्चाई से भी भली-भांति वाकिफ हैं कि अंतिम रूप से यह पुतिन ही तय करेंगे कि चुनाव कौन लड़ेगा? जैसा कि रूस के बारे में अक्सर कहा जाता है कि एक वक्त में केवल एक ही जार शासन करता है।
यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने ऐसा फैसला लिया जो रूस की विदेश नीति और प्रधानमंत्री पुतिन के साथ उनके रिश्तों को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। मेदवेदेव ने उस रूसी राजनयिक को अफ्रीकी देशों के लिये विशेष दूत नियुक्त कर दिया जो गद्दाफी शासन के कड़े आलोचक हैं। नये रूसी दूत गद्दाफी को ‘शैतानी कर्नल’ मानते हैं। मेदवेदेव का यह निर्णय इस बात का संकेत देता है कि वे अपने प्रधानमंत्री की इच्छाओं के विपरीत पश्चिमी देशों से नजदीकी रिश्ते कायम करने के इच्छुक हैं।
मेदवेदेव यहीं पर विराम लगा लेते तो सवाल कम उठते क्योंकि इससे पहले भी कई आतंरिक मुद्दों पर उन्होंने दबे स्वर में पुतिन पर निशाना साधा है। लेकिन लीबिया पर पुतिन के बयान की आलोचना कर उन्होंने रूस की आतंरिक राजनीति में भूकंप ला दिया। पुतिन के बयान की आलोचना करते समय हालांकि मेदवेदेव ने पुतिन का नाम नहीं लिया लेकिन पुतिन द्वारा प्रयुक्त कू्रसेड जैसे शब्दों को नाकाबिले बर्दाश्त करार देकर मेदवेदेव ने अमरीका को आश्चर्यजनक प्रसन्नता प्रदान कर दी है। यह सर्वविदित है कि अमरीका, पुतिन की तुलना में मेदवेदेव को ज्यादा तरजीह देता है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मौका नहीं चूके और पुतिन के घाव पर नमक छिडक़ते हुए उन्होंने लीबिया के मसले पर मेदवेदेव के बयान पर खुशी जाहिर की है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही रूस में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नीतिगत मतभेद कभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। मेदवेदेव के इस अप्रत्याशित कदम के बाद रूसी राजनीति का वह पहलू जो बहुत धुंधला नजर आता था, पूरी तरह साफ हो चुका है। दरअसल सारा झगड़ा अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर है। नि:संदेह पुतिन रूसी राजनीति में न केवल सबसे ताकतवर हैं बल्कि सर्वाधिक लोकप्रिय भी हैं। रूस के संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत अब उनके राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे में भी कोई अड़चन नहीं है। पुतिन की कोशिश रूसी राष्ट्रवादियों के मन में गहरी जड़ें जमाने की है, वहीं मेदवेदेव के प्रयास पश्चिमी जगत का सम्मान-समर्थन पाने की अभिलाषा प्रतिबिंबित करते हैं।
रूसियों के बीच मेदवेदेव द्वारा खुद को ‘उदारवादी जार’ के तौर पर पेश करने के प्रयासों का कामयाब होना संदेहास्पद लगता है। पूर्व सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गॉर्बाचेव द्वारा हाल ही में अपने 80 वें जन्मदिवस सम्मान समारोह के अवसर पर मेदवेदेव की उपस्थिति में पुतिन को दी गई यह नसीहत कि उन्हें 2012 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लडऩा चाहिये, ज्यादा असरदार नहीं हो पायेगी। दिसंबर से पहले पुतिन और मेदवेदेव को आपस में यह तय करना है कि दोनों में से कौन राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेगा। लेकिन मेदवेदेव इस सच्चाई से भी भली-भांति वाकिफ हैं कि अंतिम रूप से यह पुतिन ही तय करेंगे कि चुनाव कौन लड़ेगा? जैसा कि रूस के बारे में अक्सर कहा जाता है कि एक वक्त में केवल एक ही जार शासन करता है।
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