रूस, लीबिया पर बल प्रयोग का विरोध कर रहा है। रूस के ताकतवर प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन ने लीबिया पर हवाई हमलों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि नागरिकों की रक्षा करने की आड़ में अमरीका पहले भी अफगानिस्तान और इराक में हमले कर चुका है और अब लीबिया की बारी है। जब पुतिन ने गद्दाफी शासन के खिलाफ पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1973 को ‘कू्रसेड’ करार दिया तो वे सख्त शब्दों में रूस के परम्परागत अमरीका विरोधी रवैये को ही उजागर कर रहे थे।
यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने ऐसा फैसला लिया जो रूस की विदेश नीति और प्रधानमंत्री पुतिन के साथ उनके रिश्तों को प्रभावित किये बिना नहीं रहेगा। मेदवेदेव ने उस रूसी राजनयिक को अफ्रीकी देशों के लिये विशेष दूत नियुक्त कर दिया जो गद्दाफी शासन के कड़े आलोचक हैं। नये रूसी दूत गद्दाफी को ‘शैतानी कर्नल’ मानते हैं। मेदवेदेव का यह निर्णय इस बात का संकेत देता है कि वे अपने प्रधानमंत्री की इच्छाओं के विपरीत पश्चिमी देशों से नजदीकी रिश्ते कायम करने के इच्छुक हैं।
मेदवेदेव यहीं पर विराम लगा लेते तो सवाल कम उठते क्योंकि इससे पहले भी कई आतंरिक मुद्दों पर उन्होंने दबे स्वर में पुतिन पर निशाना साधा है। लेकिन लीबिया पर पुतिन के बयान की आलोचना कर उन्होंने रूस की आतंरिक राजनीति में भूकंप ला दिया। पुतिन के बयान की आलोचना करते समय हालांकि मेदवेदेव ने पुतिन का नाम नहीं लिया लेकिन पुतिन द्वारा प्रयुक्त कू्रसेड जैसे शब्दों को नाकाबिले बर्दाश्त करार देकर मेदवेदेव ने अमरीका को आश्चर्यजनक प्रसन्नता प्रदान कर दी है। यह सर्वविदित है कि अमरीका, पुतिन की तुलना में मेदवेदेव को ज्यादा तरजीह देता है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मौका नहीं चूके और पुतिन के घाव पर नमक छिडक़ते हुए उन्होंने लीबिया के मसले पर मेदवेदेव के बयान पर खुशी जाहिर की है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही रूस में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नीतिगत मतभेद कभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। मेदवेदेव के इस अप्रत्याशित कदम के बाद रूसी राजनीति का वह पहलू जो बहुत धुंधला नजर आता था, पूरी तरह साफ हो चुका है। दरअसल सारा झगड़ा अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर है। नि:संदेह पुतिन रूसी राजनीति में न केवल सबसे ताकतवर हैं बल्कि सर्वाधिक लोकप्रिय भी हैं। रूस के संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत अब उनके राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे में भी कोई अड़चन नहीं है। पुतिन की कोशिश रूसी राष्ट्रवादियों के मन में गहरी जड़ें जमाने की है, वहीं मेदवेदेव के प्रयास पश्चिमी जगत का सम्मान-समर्थन पाने की अभिलाषा प्रतिबिंबित करते हैं।
रूसियों के बीच मेदवेदेव द्वारा खुद को ‘उदारवादी जार’ के तौर पर पेश करने के प्रयासों का कामयाब होना संदेहास्पद लगता है। पूर्व सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गॉर्बाचेव द्वारा हाल ही में अपने 80 वें जन्मदिवस सम्मान समारोह के अवसर पर मेदवेदेव की उपस्थिति में पुतिन को दी गई यह नसीहत कि उन्हें 2012 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लडऩा चाहिये, ज्यादा असरदार नहीं हो पायेगी। दिसंबर से पहले पुतिन और मेदवेदेव को आपस में यह तय करना है कि दोनों में से कौन राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेगा। लेकिन मेदवेदेव इस सच्चाई से भी भली-भांति वाकिफ हैं कि अंतिम रूप से यह पुतिन ही तय करेंगे कि चुनाव कौन लड़ेगा? जैसा कि रूस के बारे में अक्सर कहा जाता है कि एक वक्त में केवल एक ही जार शासन करता है।
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