Sunday, April 10, 2011
कर्जन के ख्याली पुलाव
लॉर्ड कर्जन एक पक्का साम्राज्यवादी था। केवल 38 साल की उम्र में ब्रिटिश भारत का वायसराय बनने वाला कर्जन एक अत्यन्त महत्वाकांक्षी अभिजात था। 1905 में किचनर के साथ ब्रिटिश भारतीय सेना में सुधारों को लेकर हुए मतभेद के कारण विवादास्पद परिस्थितियों में कर्जन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इससे उसके राजनीतिक जीवन की उत्कर्ष यात्रा पर आंषिक विराम अवश्य लगा लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कट्टर हिमायती की उसकी छवि पर कोई आंच नहीं आई। 1914 में द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ होने के साथ ही कर्जन को अपनी प्रतिभाएं दिखाने का सुनहरा मौका मिल गया। वह सरकार में शामिल हो गया। उसकी असली नजर तो विदेश मंत्रालय पर थी। 1917 तक आते-आते कर्जन अति सक्रिय हो उठा और विदेश सचिव का पद हथियाने के लिये दांव-पेंच लड़ाने लगा। इस पद पर उस समय आर्थर बेलफर थे जिनका काम करने का तौर-तरीका कर्जन से काफी अलग था। 1919 में द्वितीय विष्व युद्ध समाप्त हो गया। जब प्रधानमंत्री लायड जॉर्ज के साथ बेलफर पेरिस शांति वार्ता में भाग लेने गये तो कर्जन को कार्यवाहक विदेश सचिव नियुक्त कर दिया गया। कुछ समय बाद जब बेलफर को लॉर्ड प्रेसिडेंट ऑव काउंसिल बनाया गया तो कर्जन को भी विदेश मंत्रालय की पूरी जिम्मेदारी दे दी गई। कर्जन की ख्वाहिश पूरी हो गयी। इसके बाद कर्जन यह सपने पाल बैठा कि वह ब्रिटिश विदेश नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करेगा। ब्रिटिश राजनय का अंतिम नियंता बनने की सनक कर्जन के मन में घर कर चुकी थी। परन्तु कर्जन को घोर निराशा ही हाथ लगी। दुनिया के देशों के साथ ब्रिटेन किस प्रकार के रिश्ते रखे, इस मुद्दे पर कर्जन अन्य मंत्रियों को अपना नेतृत्व स्वीकार कराने में नाकामयाब रहे।
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