Sunday, April 24, 2011

खुरासान के आर्य

अफगानिस्तान में पिछले तीन दशक से चल रहे युद्ध की वजह से वहां राज्य की सत्ता चरमरा चुकी है, जबरदस्त भाषाई कलह उत्पन्न हो गयी हैं और राजनीति पर नस्लवाद बुरी तरह हावी हो चुका है। दरअसल तालिबान ने अपने पंचवर्षीय कुशासन में अफगानिस्तान के अत्यन्त नाजुक नस्लीय ताने-बाने को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया था। इस गैर-जिम्मेदाराना शासन के अंत के बाद उन जाति समूहों के दृष्टिकोण को बल मिला जो राजनीतिक रूप से हाशिये पर आये हुए थे। ताजिक उनमें प्रमख हैं जो खुद को आर्य सभ्यता से जोड़ते हैं।
अफगानिस्तान में पश्तूनों की तादाद सबसे ज्यादा है लेकिन ताजिक भी वहां की जनसंख्या का एक-चौथाई हैं। ताजिकों में अब एक आजाद खुरासान राज्य की मांग उठने लगी है। अपने पक्ष में उनकी दलील यह है कि पख्तूनिस्तान की मांग अपने आप में इस बात प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अफगानिस्तान केवल पश्तूनों का ही देश है और बाकी सभी नस्लीय समुदाय को दोयम दर्जे का माना जाता है। गौरतलब है कि खुरासान राष्ट्र के बारे में औपचारिक बहस पिछले महीने काबुल में एक ताजिक नेता सैयद खलिल के अंतिम संस्कार के मौके पर शुरू हुई। राष्ट्रपति हामिद करजई प्रशासन में उपराष्ट्रपति जनरल फाहिम और कुछ मंत्रियों को इस मांग का समर्थक बताया जा रहा है।
अगर इतिहास पर नजर डालें तो खुरासान राज्य का जिक्र मुगलकालीन इतिहास में कई बार होता है। ताजिकों का मानना है कि वर्तमान ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के कई शहर जैसे निशापुर, हेरात, गजनी, काबुल, बाल्ख, समरकन्द, बुखारा एवं खीवा आदि कभी खुरासान का हिस्सा हुआ करते थे। उनका दावा है कि चौथी से नौंवी शताब्दी तक वर्तमान अफगानिस्तान का बड़ा हिस्सा खुरासान में शामिल था जहां ताजिकों का राज कायम था।
हालांकि ताजिक समूहों की इस मांग को फिलहाल व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला है लेकिन इस विवादास्पद मुद्दे पर औपचारिक बहस आरंभ होना भी बहुत बड़ी बात है। अमरीका यह दोहरा चुका है कि 2014 में वह अफगानिस्तान छोडक़र चला जायेगा, इसलिये तालिबान के बर्बर एवं कट्टरपंथी शासन का दंश झेल चुके जातीय अल्पसंख्यकों में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि अफगानिस्तान को खुरासान, पश्तूनिस्तान और हजारिस्तान में बांटने का वक्त आ गया है।
गौरतलब है कि ताजिक केवल अफगानिस्तान में ही नहीं हैं। पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद अस्तित्व में आये मध्य एशियाई गणराज्य ताजिकिस्तान में ताजिकों की आबादी करीब 80 प्रतिशत है। भाषा, संस्कृति और इतिहास के नजरिये से ताजिक ईरान के फारसी बोलने वालों से बहुत नजदीकी से जुड़े हुए हैं। मुख्यत: इस्लामिक होने के बावजूद ताजिकिस्तान ने कट्टरता का मार्ग नहीं अपनाकर धर्मनिरपेक्षता को अपनी बुनियाद बनाया। कुछ साल पहले तो बाकायदा राज्य प्रायोजित एक अभियान चलाकर सभी फारसी बोलने वाले लोगों को प्राचीन आर्यों का वशंज बताया गया। ताजिक सरकार ने तो वर्ष 2006 को आर्य सभ्यता वर्ष के तौर पर मनाया जिसके तहत कई सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया गया। राष्ट्रपति इमोमलि रहमॉन ने मध्य एशियाई सभ्यता के आर्य मूल पर जोर देते हुए कहा कि ताजिकों ने तुर्कों और मंगोलों का डटकर सामना किया है। इस दौरान बैनर और होर्डिंग पर स्वास्तिक प्रदर्शित किया गया जिसे ताजिकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक माना गया।
ताजिक इतिहासकारों के इस दावे में कितना दम है कि सभी ताजिक आर्य मूल के हैं, इसका निर्णय करना आसान नहीं है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आर्यों से खुद को जोडऩे की कोशिशें तो तभी से आंरभ हो गयी थीं जब ब्रितानी हुकूमत ने भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक एकता को खंडित करने के लिये श्वेत वर्ण वाले भारतीयों को पश्चिमी नस्ल के करीब बताया था। बीसवीं शताब्दी में जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने जर्मन जाति को श्रेष्ठ नस्ल यानी आर्य के तौर पर प्रचारित किया था। भारतीय परम्परा के शुभंकर स्वास्तिक के प्रतीक की बिलकुल उलट छवि वाला स्वास्तिक नाजियों ने अपनाकर उसे विवादास्पद बना दिया।
अफगानिस्तान में रहने वाले ताजिकों और ताजिकिस्तान के मध्य अत्यन्त प्रगाढ़ रिश्ते हैं। गौरतलब है कि तालिबान के खिलाफ संघर्ष में नॉर्दर्न एलायंस को ताजिकिस्तान ने भरपूर समर्थन दिया था। भारत ने भी हमेशा अफगानिस्तान के ताजिकों से मधुर सम्बन्ध बनाकर रखे हैं। नॉर्दर्न एलायंस, जो कि मुख्य रूप से ताजिक बाहुल्य संगठन था, के नेता अहमद शाह मसूद को तालिबान से लडऩे में भारत ने अपना पूरा समर्थन दिया था। यह केवल संयोग नहीं है कि ताजिकिस्तान मध्य एशिया में भारत का घनिष्ठतम मित्र है। राजधानी दुशानबे से थोड़ी दूरी पर स्थित ऐनी एयरफील्ड को अपग्रेड करने में भारत ने अहम भूमिका निभाई है।
इसमे कोई संदेह नहीं है कि फिलहाल खुरासान राष्ट्र की मांग का खुलकर समर्थन अफगानिस्तान के किसी भी ताजिक नेता ने नहीं किया है लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि मौजूदा परिस्थितियों में नामुमकिन दिखने वाला खुरासान राष्ट्र भविष्य में कभी अस्तित्व में ही नहीं आ सकेगा। 2014 अब ज्यादा दूर नहीं है, जब अमरीका ने अफगानिस्तान से अपनी फौज हटाने का फैसला लिया है। पाकिस्तान की पूरी कोशिश रहेगी कि अमरीका के हटते ही एक बार फिर वह अफगानिस्तान में सामरिक गहराई हासिल करने की कोशिश करे। हो सकता है कि पश्तूनों की बहुतायत वाला तालिबान फिर से पाकिस्तान के हाथ की कठपुतली बन जाये लेकिन ताजिक ऐसा हरगिज न तो चाहेंगे और न ही होने देंगे। भारत को भी उनका साथ देना होगा।

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