इस बार अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा कोई खास कमाल नहीं दिखा पायी। कल तक चीन को एशिया का नेतृत्व करने की सलाह देने वाले अमरीका की विदेश मंत्री द्वारा आज भारत को चीन से मुकाबला करने के लिये कमर कसने की सलाह अमरीकी अवसरवाद का ही नमूना है। आतंकी नेटवर्क के खिलाफ जंग में भारत को घनिष्ठ सहयोगी बताने और 2008 के मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं को सजा दिलाने की जरूरत पर बल देने के हिलेरी के बयान घिसे-पिटे और खोखले हैं।
पाकिस्तान से अपना काम निकालने के लिये अमरीका साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रपंचों को इस्तेमाल कर रहा है। परन्तु जब पाकिस्तान में विराजमान भारत विरोधी ताकतों के दमन की बात उठती है, तो अमरीकी प्रयास जबानी-जमाखर्च से आगे नहीं निकल पाते। पाकिस्तान को भारत विरोधी मुहिम समाप्त करने के लिये विवश करने की ओबामा प्रशासन की फिलहाल कोई योजना नहीं है। दरअसल भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा के साथ बातचीत में हिलेरी ने चतुराईपूर्वक कहा कि 2008 के मुंबई हमले के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमरीका, पाकिस्तान पर दबाव तो अवश्य बनायेगा लेकिन उसकी भी कुछ सीमाएं हैं। अब हिलेरी या ओबामा से यह पूछने का साहस कौन जुटा पाये कि तालिबानी शासन को उखाडऩे के लिये 2001 मेें अफगानिस्तान पर फौजी हमला और आतंक के सरगना बिन लादेन को मारने के लिये पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते समय उन कथित ‘सीमाएं’ की याद अमरीका को क्यों नहीं रही जिसकी दुहाई आज वो भारत को दे रहा है।
हकीकत यही है कि अमरीका उसी आतंकवाद से सख्ती से निपट रहा है और निपटेगा जो केवल उसके लिये खतरा पैदा करता है। हालांकि पिछले दिनों अमरीका ने पाकिस्तान को प्रतिवर्ष दी जाने वाली सैनिक सहायता के कुछ हिस्से पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन अमरीका का यह कदम अफगान समीकरण की उपज है, न कि भारत की गुहार का परिणाम। वैसे आतंकवाद के मसले पर अमरीका ने भारत को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। ऐसा लगता है कि अमरीका यह बात समझ चुका है कि भारत में पाकिस्तान प्रायोजित बम धमाकों के तुरंत बाद पीडि़त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने और किसी बड़े अमरीकी पदाधिकारी की भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान को आतंकवाद के लिये फटकार लगाने से ही काम चल जायेगा। भारत को बहुत हल्के तौर पर लेने की एक बड़ी वजह यह भी है कि हमारी पाकिस्तान नीति में ही स्पष्टता नहीं है। कभी बातचीत चालू और कभी बातचीत बंद।
भारत के लिये यह तथ्य कोई सनसनीखेज नहीं है कि कश्मीर मुद्दे पर अमरीकी नीति को प्रभावित करने के लिए पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई अमरीकी नेताओं को डॉलर में तोलने से भी परहेज नहीं करती है। इसी हफ्ते यह खुलासा हुआ है कि पाकिस्तानी मूल के सैयद गुलाम नबी फई और जहीर अहमद अमरीका में गैरकानूनी तरीके से लॉबिंग का काम कर रहे थे। अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई का आरोप है कि दोनों लम्बे समय से अमरीका में साजिश रच रहे हैं और पाकिस्तान सरकार के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। भारत इस बात से अच्छी तरह अवगत है कि पाकिस्तान हर मुमकिन तरीके से भारत विरोधी षड्यंत्र करता रहता है। पश्चिमी देशों, खासकर ब्रिटेन और अमरीका, में कश्मीरी आतंकवादियों को वहां के राजनेता गैर सरकारी संगठनों की आड़ में सरंक्षण और पोषण देते रहे हैं।
कितनी अजीब बात है कि अब भारत के इन दावों को इसलिये गंभीरता से सुना-समझा जायेगा क्योंकि एफबीआई ने उस पर मुहर लगा दी है। एक तरफ तो पाकिस्तानी फौज पर दबाव डालने में आनाकानी और दूसरी तरफ अमरीका में भारत-विरोधी षड्यंत्रकारियों का पर्दाफाश। अमरीका की इस विरोधाभासी नीति को समझे बिना भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर सकता। क्या यह बात आसानी से भुलाई जा सकती है कि अतीत में भारत के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा किये गये कुचक्रों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अमरीका की भी भूमिका रही है।
पाकिस्तान की नीयत में खोट होने के अनगिनत सबूत मिल चुके हैं। आतंकवाद पाकिस्तान का मूल चरित्र है जिसका प्रयोग उसने भारत को डराने और अमरीका को उलझाने के लिये ही किया है। जब तक अमरीका आतंक के सबसे बड़े पोषक देश पाकिस्तान को आतंक के खिलाफ अभियान में सहयोगी मानने की भयंकर भूल करता रहेगा, तब तक भारत से निकटता स्थापित करने के उसके सभी प्रयास आधे-अधूरे एवं अवसरवादी ही माने जायेंगे। अगर अमरीका के कंधों पर नाच रहे पाकिस्तानी हुक्मरानों की अक्ल हमेशा के लिये ठिकाने लगा दी जाये तो एशिया का नेतृत्व भारत के हाथ में देखने की हिलेरी की ख्वाहिश अधूरी नहीं रहेगी।
Wednesday, July 27, 2011
Sunday, July 24, 2011
अमरीका और पाकिस्तान में फिर तनाव
अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई ने पाकिस्तानी मूल के दो अमरीकी नागरिकों को अमरीका के लॉबिंग कानून का उल्लंघन करने को दोषी ठहराया है। उनमें से एक, गुलाम नबी फई, वाशिंगटन स्थित कश्मीरी अमरीकी काउंसिल (केएसी) चलाता है। फई पर आरोप है कि वह भारतीय कश्मीर में अमरीकी नीति को प्रभावित करने के लिये पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा उपलब्ध कराये गये धन से अमरीकी सांसदों की हथेली गरम करता था। यह गिरफ्तारी बहुत अहम वक्त हुई है। दरअसल इसी महीने के आरंभ में आईएसआई ने एक पाकिस्तानी डॉक्टर शकील अफरीदी को इस आरोप में गिरफ्तार किया कि उसने अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए को एबटाबाद में उस ऑपरेशन में सहयोग किया जिसके जरिये आतंक के सरगना ओसामा बिन लादेन का सफाया किया गया था। तो क्या इसका यह अर्थ लगाया जाये कि अमरीका ने फई को गिरफ्तार कर इस्लामाबाद को संदेश दे दिया है कि अगर वह लक्ष्मण रेखा पार करेगा तो अमरीका भी उन जगहों से वाकिफ हैं जहां दबाने पर पाकिस्तान को सबसे ज्यादा दर्द होता है।
निश्चित तौर पर फई की गिरफ्तारी से अमरीका-पाकिस्तान संबंध एक नए, परन्तु अत्यन्त असहज दौर में प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन यह मानना जल्दबाजी होगा कि अमरीका ने पाकिस्तान की उस दलील को नकारना शुरू कर दिया है कि कश्मीर के सुलझते ही अफगानिस्तान स्वत: सुलझ जायेगा।
निश्चित तौर पर फई की गिरफ्तारी से अमरीका-पाकिस्तान संबंध एक नए, परन्तु अत्यन्त असहज दौर में प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन यह मानना जल्दबाजी होगा कि अमरीका ने पाकिस्तान की उस दलील को नकारना शुरू कर दिया है कि कश्मीर के सुलझते ही अफगानिस्तान स्वत: सुलझ जायेगा।
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