Sunday, April 10, 2011

अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा

अगर मीडिया खबरों को सही मानें तो अमेरिका और पाकिस्तान के साझा खुफिया ऑपरेशन जनवरी से ही ठंडे बस्ते में पड़े हैं। वजह सीआईए एजेंट रेमंड डेविस द्वारा लाहौर में किया गया दोहरा हत्याकांड है। हालांकि डेविस को रिहा कर दिया गया लेकिन जिस विवादास्पद परिस्थितियों में उसकी रिहाई हुई, उससे पाकिस्तानी जनमानस, खासकर कट्टरपंथी तत्व, काफी आग-बबूला नजर आये। उसके बाद अमेरिका के ड्रोन हमले में 41 लोग मारे गये, जिसकी पाकिस्तान के सर्वोच्च सैन्य हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। पाकिस्तानी खुफिया संस्थाओं को इस हमले की जानकारी नहीं थी, सेना की कड़ी प्रतिक्रिया अमेरिका की एकतरफा कार्रवाई के प्रति पाकिस्तान के आक्रोशित प्रतिरोध का इजहार था। पिछले दस सालों के दौरान पाकिस्तान में जिहादियों के सफाये के लिये सीआईए को काफी अधिकार हासिल हुए हैं। पाकिस्तान की धरती पर खुफिया गतिविधियों का संचालन कोई नई बात नहीं है लेकिन रेमंड डेविस की गिरफ्तारी के बाद हुए रहस्योद्घाटनों एवं आरोपों-प्रत्यारोपों ने पाकिस्तानी जनता के समक्ष सीआईए की उपस्थिति की हद का खुलासा कर दिया है। 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की उम्मीद लगाये बैठी पाकिस्तानी फौज अफगानिस्तान में अपने प्रभाव का विस्तार करने की जुगाड़ करने में लगी है।

यह तथ्य अमेरिका से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान इस समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसकी जड़ है। पाकिस्तानी सेना चाहे कितना भी क्यों न छटपटाये, वो अमेरिका के चंगुल से नहीं बच सकती। मौजूदा हालात में, जब पाकिस्तान अनेक राजनीतिक और आर्थिक संकटों का सामना कर रहा है, वह अमेरिका को पीठ दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहरे निकलने में पाकिस्तान की मदद की दरकार है और दूसरी ओर पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका की आर्थिक सहायता पर निर्भर है। जाहिर है कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही मददख्वाह भी हैं और मददगार भी। ऐसे में यह अवसरवादी रिश्ता कायम रहेगा।

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